Thursday, February 16, 2017

"चलते रहे कदम तो,

"चलते रहे कदम तो,
              किनारा जरुर मिलेगा !!
अन्धकार से लड़ते रहो,
              सवेरा जरुर खिलेगा !!
जब ठान लिया मंजिल पर जाना,
              रास्ता जरुर मिलेगा !!
ए राही न थक, चल...
              एक दिन समय जरुर फिरेगा !

🌹"निंदा" से घबराकर अपने "लक्ष्य" को ना छोड़े  क्योंकि...."लक्ष्य" मिलते ही निंदा करने वालों की "राय" बदल जाती है।🌹
           🙏सुप्रभात🙏

Wednesday, February 15, 2017

नर से नारायण बनने का परम पुरुषार्थ

👉 नर से नारायण बनने का परम पुरुषार्थ

👉 नर से नारायण बनने का परम पुरुषार्थ

🔵 ईश्वर प्राप्ति को जीवन का परम पुरुषार्थ कहा गया है। महान् के साथ तुच्छ की घनिष्ठता स्थापित होने पर लाभ ही लाभ है। इस प्रक्रिया के आधार पर नगण्य को भी महान् बनने का अवसर मिलता है। नालागंगा में मिलकर उसी का नाम धारण कर लेता है। बूँद का विसर्जन उसे विराट् सागर बना देता है। उपेक्षणीय ईंधन देखते-देखते प्रचण्ड अग्नि का रूप धारण कर लेता है। पाणिग्रहण करने के उपरान्त पत्नी तत्काल अपने पति की समस्त सम्पदा पर सहज अधिकार प्राप्त कर लेती है। वृक्ष से लिपट कर दुबली कमर वाली बेल भी उतनी ही ऊँची उठ जाती है। वादक होठों से सटने पर पोले बाँस की नली को मनमोहक वंशी के रूप में श्रेय सम्मान मिलता है। कठपुतली का नाच वस्तुतः उन लकड़ी के टुकड़ों का कलाकार की अँगुलियों के साथ समर्पित भाव से बँध जाने के अतिरिक्त और कुछ है नहीं।
🔴 ऊँचे तालाब और नीचे तालाब के बीच एक सम्बन्ध स्थापित करने वाली नाली बना दी जायतो दोनों की सतह एक होने तक ऊँचे का प्रवाह नीचे की ओर बहता रहेगा। जेनरेटर के साथ सम्बन्ध सूत्र स्थापित होते ही बल्बपंखे आदि उपकरण तत्काल गतिशील होते हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि परमात्मसत्ता के साथ घनिष्टता स्थापित करने वाले भगवद् भक्त क्यों कर देवात्मा माने गयेकिस कारण अपना और समस्त संसार का कल्याण कर सकने में समर्थ हुएप्रगति का उच्चतम सोपान यही है कि आत्मा-परमात्मा के स्तर तक जा पहुँचे और सर्वोत्कृष्ट शिखर पर अवस्थित होकर दूसरों के व अपने बीच का आकाश-पाताल जैसा अन्तर देखे।
🔵 प्रगति यदि किसी को सचमुच ही अभीष्ट है तो उसे बहिरंग के वैभव में नहींअन्तरंग के वर्चस् में तलाशा जाना चाहिए। एक ही उपाय का अवलम्बन लिया जाना चाहिए-महानता के साथ अपनी क्षुद्रता को जोड़ देना। कामना का भावना मेंसंकीर्णता का व्यापकता मेंनर का नारायण में विलय-विसर्जन उसी परम पुरुषार्थ का सुनिश्चित स्वरूप हैजिसे ईश्वर प्राप्ति कहते हैं जिसे पा लेने के बाद फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या 🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 16

जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा ही ‘मोक्ष’

👉 जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा ही ‘मोक्ष’

🔵 मोक्ष क्या हैमुक्ति क्या हैयह प्रश्न हर भारतीय संस्कृति के पक्षधर मानव के मन में सहज ही उठता रहा हैसदा से हीउसके पृथ्वी आविर्भाव के काल से। कई व्यक्ति यह समझते हैं मोक्ष मरने के बादशरीर रूपी बंधन के छूटने के बाद ही मिलता है। इसके लिए वे दान-पुण्य आदि अनेकानेक कृत्य करते भी देखे जाते हैं। किन्तु क्या वास्तविक मोक्ष इससे मिल जाता हैऋषियों की दृष्टि से देखें तो यह एक ऐसी विधा है जिसका अन्तर्चक्षुओं से साक्षात्कार कर समझना होगा।

🔴 ऋषि- मनीषा कहती है कि जो मोह का क्षय करेवही मोक्ष है। यह सदेह जीवन मुक्त स्थिति किसी को भी प्रयास करने पर मिल सकता है। मोक्ष वस्तुतः जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा का नाम है। वासना-तृष्णा-अहंता रूपी त्रिविध बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर आत्मतत्त्व की ओर उन्मुख होने का पुरुषार्थ ही मोक्ष है। इस मोक्ष देने वाले ज्ञान का स्वरूप भारतीय दर्शन की विभिन्न विचार धाराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है,किन्तु लक्ष्य सभी का एक है-जीव को बंधनों से मुक्त करना। वस्तुतः मानव जीवन मिला ही इसलिए है कि हर व्यक्ति इस परम पुरुषार्थजिसे निर्वाण मुक्ति या अपवर्ग कुछ भी नाम दे देंके लिए कर्म कर व परमतत्त्व की प्राप्ति हेतु इस प्रयोग को सार्थक बनाए। मोक्ष प्राप्ति हेतु किये जाने वाले इस कर्म को यदि जीवन जीने की कला कहा जाय तो अत्युक्ति नहीं होगी।

🔵 गीता में योगेश्वर कृष्णइस कला का जिसमें बंधनमुक्ति या मोक्ष प्राप्ति का सन्देश दिया गया हैबड़ा ही सुन्दर शिक्षण धनञ्जय को देते हैं। मोक्ष को गीताकार जीवन के एक सकारात्मक पक्ष के रूप में लेता है। कर्म करते हुए व उन कर्मों को मन से परम सत्ता को अर्पण करते हुए यदि कोई पुरुषार्थ करता है (मयि सन्यस्य मत्परः) तो वह मोक्ष इस जीवन में ही पा लेता है। कर्म करते हुए व्यक्ति को अनेकानेक बन्धनों को काटना पड़ता है,जिनमें लोभ प्रधानमोह प्रधान व अहं प्रधान ये तीन प्रमुख है। बन्धन सदा दुष्प्रवृत्तियों के ही होते हैं। इनसे छुटकारा पा लेनाज्ञान द्वारा भवबन्धनों से मुक्ति पा लेना ही मोक्ष है। यदि यह दूरदर्शिता हमारे अन्दर आ जाए तो मोक्ष का तत्त्वज्ञान समझते हुए हम जीवन को सफलता की चरमसीमा तक पहुँचा सकते हैं। यह मार्ग ऋतम्भरा प्रज्ञा के आश्रय के रूप में प्रत्येक के लिए खुला है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 15

गहना कर्मणो गतिः

👉 गहना कर्मणो गतिः

👉 गहना कर्मणो गतिः


🔵 वेद में ऋषि कहते हैं-‘‘उत्थानं ते पुरुष नावयानम्’’ अर्थात् हे जीव! तुझे उठना है,नीचे नहीं गिरना है। मानव योनि में आकर तो तू ‘स्व’ की गरिमा को पहचान व स्वयं को ऊँचा उठा। ‘‘कितने हैं जो इस मर्म को समझ पाते हैं कि मनुष्य जीवन हमें अपने पशुत्व को उभारने के लिए नहींदेवत्व को विकसित करने के लिए मिला है। कर्मों की श्रेष्ठता द्वारा मनुष्य निश्चित ही उस पुल को पार कर सकता है जो देवत्व एवं पशुत्व के बीच बना सेतु अनन्तकाल से हम सबकी प्रगति की यात्रा का राज मार्ग बना हुआ है। इस पुल तक पहुँचनादेवत्व को पहचानना व फिर उस यात्रा पर चल पड़ना जिनसे भी सम्भव हो पाता हैवे सभी विवेकशीलदूरदर्शी देवमानव कहे जाते हैं।’’

🔴 गीताकार के अनुसार किसी भी काल में क्षणमात्र भी कोई कर्म किए बिना रह नहीं सकता। भगवान् स्वयं कहते हैं कि यदि वे भी एक क्षण कर्म करना बन्द कर दें तो सारा विश्व नष्ट हो जाय। सारा लोक व्यवहार नष्ट हो जाए। कर्म करते रहनाकर्त्तव्यपरायण बने रह कर मनुष्य जीवन को सतत् प्रगति की ओरदेवत्व की ओर बढ़ाते चलना ही मनुष्य की सहज नियति है। यह बात अलग है कि कर्म का स्वरूप जाने बिना जब मनुष्य अशुभ कर्मों मेंअकर्मोंविकर्मों में निरत हो जाता है तो वह जीवन यात्रा को चलाते हुए भी पतन की ओर ही जाता देखा जाता है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं ‘‘कर्म क्या है,अकर्म क्या है इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रम में पड़ जाते हैं,इसीलिए सभी को कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिएअकर्म का भीविकर्म का भीक्योंकि कर्म की गति गहन है।’’ (गहना कर्मणो गतिः)

🔵 अकर्म उन्हें कहा जाता है जिन्हें न करने से पुण्य तो नहीं होताकिन्तु किये जाने पर पाप लगता है। विकर्म उन्हें कहते हैं जो परिस्थिति विशेष के अनुसार वास्तविक रूप से कुछ अलग स्वरूप ले चुके हैं तथा निषिद्ध कर्म बन गए हैंयथा कुपात्र को दान देना। कर्म में अकर्म तथा अकर्म में कर्म देखने का नीर-क्षीर विवेक पैदा करने के लिए गीताकार मार्गदर्शन करता हुआ कहता है कि मनुष्य को यज्ञ के निमित्त किये जाने वाले कर्मों को बिना किसी आसक्ति के करते रहना चाहिए तो फिर भटकने की कोई संभावना नहीं है। यज्ञ के निमित्त अर्थात् परमार्थ प्रयोजनों के लिए। जो भी कर्म इस भाव से किये जायेंगे वे सत्कर्म कहलायेंगे व बन्धनों से परे व्यक्ति को जीवन्मुक्ति की ओर ले जायेंगे। हम इस छोटे से तत्त्वदर्शन को समझ लें कि परमार्थ में ही स्वार्थ है तो दुनिया के माया-जंजाल सेभवबन्धनों से मुक्ति सहज ही मिल सकती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या 
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 14

👉 आस्तिकता का यथार्थ


👉 आस्तिकता का यथार्थ

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 आस्तिकता का यथार्थ
🔵 आम लोगों की सामान्य धारणा यही है कि भगवान् मोर-मुकुट धारी रूप में होते हैं व समय-समय पर पाप बढ़ने पर पौराणिक प्रस्तुति के अनुसार वे उसी रूप में आकर राक्षसों से मोर्चा लेते व धर्म की स्थापना करते हैं। बहिरंग के पूजा कृत्यों से उनका प्रसन्न होना व इस कारण उतने भर को धर्म माननायह एक जन-जन की मान्यता है व इसी कारण कई प्रकार के भटकाव भरे धर्म के दिखाने वाले क्रिया-कलाप अपनी इस धरती पर दिखाई देते हैं। जोरों से आरती गाई जाती हैनगाड़े-शंख आदि बजाए जाते हैंएवं चरणों पर मिष्ठान्न के ढेर लगा दिए जाते हैं। सवा रूपये व चंद अनुष्ठानों के बदले भी उनकी अनुकम्पा खरीदने के दावे किये जाते हैं। प्रश्न यह उठता है कि आस्तिकता के बढ़ने का क्या यही पैमाना है जो आज बहिर्जगत् में हमें दिखाई दे रहा है?विवेकशीलता कहती है कि ‘‘नहीं’’।
🔴 ईश्वर विश्वास तब बढ़ता हुआ मानना चाहिए जब समाज में जन-जन में आत्मविश्वास बढ़ता हुआ दिखाई पड़े।आत्मावलंबन की प्रवृत्ति एवं श्रमशीलता की आराधना से विश्वास अभिव्यक्त होता दीखने लगे। आस्तिकता संवर्धन तब होता हुआ मानना चाहिए जब एक दूसरे के प्रति प्यार-करुणा-ममत्व के बढ़ने के मानव मात्र के प्रति पीड़ा की अनुभूति के प्रकरण अधिकाधिक दिखाई देने लगें एवं वस्तुतः समाज के एक-एक घटक में ईश्वरीय आस्था परिलक्षित होने लगे।कोई भी अभावग्रस्त हो एवं अपना अन्तःकरण उसे ऊँचा उठाने के लिए छलछला उठे तो समझना चाहिए कि वास्तव में भगवत् सत्ता वहाँ विद्यमान है। 
🔵 अनीति-शोषण होता हुआ देखकर भी यदि कहीं किसी के मन में किसी की सहायता का आक्रोश नहीं उपज रहा है तो मानना चाहिए कि बहिरंग का आस्तिक यह समुदाय अभी अन्दर से उतना ही दिवालियाभीरु व नास्तिक है। जब ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास बढ़ने लगता हैतो देखते-देखते लोगों के आत्मबलों में अभिवृद्धिसंवेदना की अनुभूति के स्तर में परिवर्तन तथा सदाशयता का जागरण एक सामूहिक प्रक्रिया के रूप में चहुँ ओर होता दीखायी पड़ने लगता है।
🔴 आज का समय ईश्वरीय सत्ता के इसी रूप के प्रकटीकरण का समय है। प्रसुप्त संवेदनाओं का जागरण ही भगवत् सत्ता का अन्तस् में अवतरण है। आस्था संकट की विभीषिका इसी से मिटेगी व यही आस्तिकता का संवर्धन कर जन-जन के मनों के सन्ताप को मिटाएगी। हमें इसी प्रज्ञावतार को आराध्य मानकर अपने क्रियाकलाप तदनुरूप ही नियोजित करने चाहिए।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या 🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 13

👉 सफलता के मणिमुक्तक पाएँ, तो कैसे?

👉 सफलता के मणिमुक्तक पाएँ, तो कैसे?

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 सफलता के मणिमुक्तक पाएँतो कैसे?
🔵 सफलता पानी है तो उसके लिए प्रबल संकल्प शक्ति तथा सतत् अध्यवसाय एक अनिवार्य शर्त है। स्वतः हम हर कार्य में सफल होते चले जाएँगेकोई दैवी अनुकम्पा किसी के आशीर्वाद सेकुछ तन्त्र-मन्त्र-कर्मकाण्डादि से हम पर  बरसती चली जाएगीयह आशा करना तो शेखचिल्ली का सपना भर है। सफलता के मणिमुक्तक यूँ ही धूल में बिखरे हुए नहीं पड़े हैं। उन्हें पाने के लिए गहरे में उतरने की हिम्मत इकट्टी करनी होगीकठोर परिश्रम करने व करते रहने की शपथ लेनी होगी। कठोर,दमतोड़ और टपकते स्वेद कणों वाला परिश्रम ही जीवन का सबसे श्रेष्ठ उपहार है। इसी के फलस्वरूप लौकिक जीवन की समस्त सफलताओं-विभूतियों को पाया जा सकता है।
🔴 सुअवसर की प्रतीक्षा में बैठे रहनाकुछ न कर काहिली में उपलब्ध समय रूपी सम्पदा को गँवा बैठना तो मानव जीवन की सबसे बड़ी मूर्खता है। उद्यम के लिए हर घड़ी हरपल एक शुभ मुहूर्त हैसुअवसर है। सस्ती सफलता-शीघ्र सिद्धि प्राप्त करने की ललक के फेर में पड़े रहने से वस्तुतः कुछ भी लाभ नहीं। कुण्डलीफलित ज्योतिष-सर्वार्थ सिद्धि योग आदि में समयक्षेप अवसर चूक जाने के बाद काफी फछतावा देता है। चिरस्थायी प्रगति के लिए राजमार्ग पर अनवरत परिश्रम और अपराजेय साहस को साथ लेकर चलना होगा।
🔵 पगडण्डियाँ या ‘‘शार्टकट’’ ढूँढ़ना बेकार है। वे भटका सकती हैं। जिनने भी कुछ सफलता पायी हैजिसे इतिहास में लिखा गयाउन्हें गहराई तक खोदने व उतरने के लिए कटिबद्ध होना पड़ा है। विजय श्री का वरण करने के लिए कमर कसनाआस्तीन चढ़ाना और खोदने की प्रक्रिया आरम्भ कर देना आवश्यक हैपर ध्यान यह भी रखा जाना चाहिए कि अनावश्यक उतावली से कहीं कुदाली से पैर ही न कट जायँ।
🔴 परिस्थितियाँसाधन एवं क्षमता का समन्वय करके आगे बढ़ना ही समझदारी है।यही सफलता के लिए अपनायी गयी सही रीति-नीति हैकिन्तु यह तथ्य गाँठ बाँध लिया जाना चाहिए कि सफलता केवल समझदारी पर ही तो निर्भर नहीं हैउसका मूल्य माथे से टपकने वाले श्रम-सीकरों से ही चुकाना पड़ता है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या 🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 12

👉 हम अपने भीतर झाँक ना सीखें


👉 हम अपने भीतर झाँक ना सीखें
 🔵 व्यक्ति दूसरों के विषय में अधिकाधिक जानने का प्रयास करे अथवा उनकी भावनाओं से परिचित होना चाहेउससे पहले अपने विषय में अधिकाधिक जान लेना चाहिए। अपने मन की भाषा को,आकांक्षाओं को-भावनाओं को बहुत स्पष्ट रूप से समझासुना और परखा जा सकता है। अपने बारे में जानकर अपनी सेवा करना,आत्म सुधार करना अधिक सरल है,बनिस्बत इसके कि हम औरों को-सारी दुनिया को बदलने का प्रयास करें। जितना हम अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लेंगेयह संसार हमें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होने लगेगा।
🔴 हम दर्पण में अपना मुख देखते हैं एवं चेहरे की मलिनता को प्रयत्नपूर्वक साफ कर उसे सुन्दर बना डालते हैं। मुख उज्ज्वल-साफ और अधिक सुन्दर निकल आता है। मन की प्रसन्नता बढ़ जाती है। अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और उसे भली-भाँति परखने से उसकी मलिनताएँ भी दिखाई देने लगती हैंसाथ ही सौन्दर्य भी। कमियों को दूर करनामलिनता को मिटाना और आत्म निरीक्षण द्वारा पर्त दर पर्त्त गन्दगी को हटाकर आत्मा के अनन्त सौन्दर्य को प्रकट करना ही सच्ची उपासना है। जब सारी मलिनताएँ निकल जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वलसाफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है। फिर बहिरंग में सभी कुछ अच्छा-सत्चित् आनन्दमय नजर आने लगता है।
🔵 हमें अपने आपसे प्रश्न करना चाहिए-क्या हमारे विचार गन्दे हैंकामुकता के चिन्तन में हमारा मन रस लेता हैक्या हमें इन्द्रियजन्य वासनाओं से मोह हैक्या हम उस परमसत्ता के हमारे बीच होते हुए भी भयभीत हैंयदि इस प्रश्न का उत्तर हाँ है तो हमें अपने सुधार में जुट जाना चाहिए।वस्तुतः अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन हमें अपने ऊपर के प्रश्नों का उत्तर नहीं में मिलने लगेगाउस दिन से हम संसार के सबसे सुखी व्यक्ति बन जाएँगे।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या 🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 11

  

"चलते रहे कदम तो,

"चलते रहे कदम तो,               किनारा जरुर मिलेगा !! अन्धकार से लड़ते रहो,               सवेरा जरुर खिलेगा !! जब ठान लिया मंजिल प...