Saturday, February 11, 2017

महाराणा हम्मीरदेव ने अपने पौरुष के द्वारा खिलजी से चित्तौड़ को पुनः जीत लिया, इस मौके की एक ओजस्वी रचना- ‘भजन इतिहास महारानी पद्मिनी’ से ठेठ हरयाणवी तर्ज में

महाराणा हम्मीरदेव ने अपने पौरुष के द्वारा खिलजी से चित्तौड़ को पुनः जीत लिया, इस मौके की एक ओजस्वी रचना- ‘भजन इतिहास महारानी पद्मिनी’ से ठेठ हरयाणवी तर्ज में

रचना: स्व0 पं0 चन्द्रभानु आर्योपदेशक संस्थापक शांतिधर्मी

खिलजी का रंग, कर दिया भंग, जंग जीत कै गया हमीर।।टेक।।
करकै तलाश गया बनोवास वह राणा जी के पास।
करकै नाश शत्रु का खास ये मिटा दिया संत्रास।
अजयसिंह का ख्याल पहुंचा तत्काल आ मेरे लाल रणधीर।।1।।
शत्रु को मोड़ ले ली चित्तौड़ जब सुन पाया ये बात।
तैने मेरे चन्द दिए काट फंद बस आनन्द होग्या गात।
ये तेरी खलक किया राजतिलक बस अपनी अंगुली चीर।।2।।
बेटा तू है ढेठा, जेठा फेटा मुझसे आन।
गौ भक्षक को कर तक्षक तेरा रक्षक है भगवान।
तनै मेरी लाज ली बचा आज तुम करो राज मेरे वीर।।3।।
धरकै ध्यान सुनलो जवान ये होते हैं बलवान।
आन बान और शान की खातिर हो जाते कुर्बान।।
कहै चन्द्रभान जरा करकै कान पहचान मेरी तकरीर।।4।।

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