👉 भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है। (अंतिम भाग)
Atmiya Parijan सुनील कुमार!
👉 भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है। (अंतिम भाग)
🔵 जो लोग सफलता के मार्ग में होने वाले विलम्ब की धैयपूर्वक प्रतीक्षा नहीं कर सकते, जो लोग अभीष्ट प्राप्ति के पथ में आने वाली बाधाओं से लड़ना नहीं जानते वे अपनी अयोग्यता और ओछेपन को बेचारे भाग्य के ऊपर थोप कर स्वयं निर्दोष बनने का उपहासास्पद प्रयत्न करते हैं। ऐसी आत्म वंचना से लाभ कुछ नहीं हानि अपार है। सबसे बड़ी हानि यह है कि अपने को अभागा मानने वाला मनुष्य आशा के प्रकाश से हाथ धो बैठता है और निराशा के अन्धकार में भटकते रहने के कारण इष्ट प्राप्ति से कोसों पीछे रह जाता है।
🔴 इतिहास पर दृष्टिपात कीजिए,जिन महापुरुषों ने बड़े-बड़े कार्य किये हैं उन्होंने एक से एक बढ़कर आपत्तियों को झेला है। यदि वे हर एक कठिनाई के समय ऐसा सोचते कि “हमारे भाग्य में यदि सफलता बंधी होती तो यह बाधा क्यों उपस्थित होती, इसलिए जब कोई बात भाग्य में ही नहीं है तो प्रयत्न क्यों करे?” विचार कीजिए कि ऐसी मान्यता यदि उन्होंने रखी होती तो क्या वे इतने महान बने होते?
🔵 बाधाएं, कठिनाइयाँ, आपत्तियाँ और असफलताएं एक प्रकार की कसौटी हैं जिन पर पात्र-कुपात्र की खरे-खोटे की परख होती है। जो इस कसौटी पर खरे उतरते हैं, सफलता के अधिकारी सिद्ध होते हैं उन्हें ही इष्ट की प्राप्ति होती है। जो सस्ती सफलता के फिराक में रहते हैं, बिना अड़चन और स्वल्प प्रयत्न में जो मनमाने मनसूबे पूरे करना चाहते हैं वे न तो प्रकृति के नियमों को समझते हैं न ईश्वरीय विधान को। उन्हें जानना चाहिए कि कायर पुरुष भाग्य की दुहाई देते रहते हैं और उद्योगी पुरुष सिंह विजय लक्ष्मी प्राप्त करते हैं।
🌹 समाप्त🌹 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949पृष्ठ 30
http://awgpskj.blogspot.in/ 2017/02/blog-post_7.html
🔵 जो लोग सफलता के मार्ग में होने वाले विलम्ब की धैयपूर्वक प्रतीक्षा नहीं कर सकते, जो लोग अभीष्ट प्राप्ति के पथ में आने वाली बाधाओं से लड़ना नहीं जानते वे अपनी अयोग्यता और ओछेपन को बेचारे भाग्य के ऊपर थोप कर स्वयं निर्दोष बनने का उपहासास्पद प्रयत्न करते हैं। ऐसी आत्म वंचना से लाभ कुछ नहीं हानि अपार है। सबसे बड़ी हानि यह है कि अपने को अभागा मानने वाला मनुष्य आशा के प्रकाश से हाथ धो बैठता है और निराशा के अन्धकार में भटकते रहने के कारण इष्ट प्राप्ति से कोसों पीछे रह जाता है।
🔴 इतिहास पर दृष्टिपात कीजिए,जिन महापुरुषों ने बड़े-बड़े कार्य किये हैं उन्होंने एक से एक बढ़कर आपत्तियों को झेला है। यदि वे हर एक कठिनाई के समय ऐसा सोचते कि “हमारे भाग्य में यदि सफलता बंधी होती तो यह बाधा क्यों उपस्थित होती, इसलिए जब कोई बात भाग्य में ही नहीं है तो प्रयत्न क्यों करे?” विचार कीजिए कि ऐसी मान्यता यदि उन्होंने रखी होती तो क्या वे इतने महान बने होते?
🔵 बाधाएं, कठिनाइयाँ, आपत्तियाँ और असफलताएं एक प्रकार की कसौटी हैं जिन पर पात्र-कुपात्र की खरे-खोटे की परख होती है। जो इस कसौटी पर खरे उतरते हैं, सफलता के अधिकारी सिद्ध होते हैं उन्हें ही इष्ट की प्राप्ति होती है। जो सस्ती सफलता के फिराक में रहते हैं, बिना अड़चन और स्वल्प प्रयत्न में जो मनमाने मनसूबे पूरे करना चाहते हैं वे न तो प्रकृति के नियमों को समझते हैं न ईश्वरीय विधान को। उन्हें जानना चाहिए कि कायर पुरुष भाग्य की दुहाई देते रहते हैं और उद्योगी पुरुष सिंह विजय लक्ष्मी प्राप्त करते हैं।
🌹 समाप्त🌹 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949पृष्ठ 30
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👉 पक्षपात किया जाए तो इस तरह
🔴 किसी ने आक्षेप लगाया संत विनोबा पर "विनोबा जी तो शत्रु का पक्ष लेने की बात कहते हैं।" विनोबा जी ने सुना और एक स्थान पर उसका स्पष्टीकरण भी दे दिया। उन्होंने बतलाया पक्ष न लिया जाए यह अच्छा है किन्तु यदि लेना पडे तो शत्रु का ही लेने योग्य है। मित्र का क्या पक्ष लिया जाए-वह तो अपना है ही। मित्र के पक्ष में तो बुद्धि सहज हो जाती?प्रयासपूर्वक शत्रु के पक्ष मे लगाने पर ही पक्षपात से आंशिक मुक्ति पाई जा सकती है।
🔵 समाधान बहुत प्रमाणिक तथा विवेकपूर्ण ढंग से किया गया है। संत विनोबा की बुद्धि तथा विवेक पर......Read Full Story Please Click👇👇👇👇👇👇👇
http://awgpskj.blogspot.in/ 2017/02/blog-post_98.html
🔴 किसी ने आक्षेप लगाया संत विनोबा पर "विनोबा जी तो शत्रु का पक्ष लेने की बात कहते हैं।" विनोबा जी ने सुना और एक स्थान पर उसका स्पष्टीकरण भी दे दिया। उन्होंने बतलाया पक्ष न लिया जाए यह अच्छा है किन्तु यदि लेना पडे तो शत्रु का ही लेने योग्य है। मित्र का क्या पक्ष लिया जाए-वह तो अपना है ही। मित्र के पक्ष में तो बुद्धि सहज हो जाती?प्रयासपूर्वक शत्रु के पक्ष मे लगाने पर ही पक्षपात से आंशिक मुक्ति पाई जा सकती है।
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