Thursday, February 9, 2017

दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (अन्तिम भाग)

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (अन्तिम भाग)

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (अन्तिम भाग)

🔵 किसी में गुण की कल्पना न कर सकने के कारण दोषदर्शी अविश्वासी भी होता है। वह किसी की सद्भावना एवं सहानुभूति में भी कान खड़े करने लगता है। प्रेम एवं प्रशंसा में भी स्वार्थपूर्ण चाटुकारिता का दोष देखता है। इसलिये संपर्क में आने और स्नेहपूर्ण बरताव करने वाले हर व्यक्ति से भयाकुल और शंकाकुल रहा करता है। उसे विश्वास ही नहीं होता कि संसार में कोई निःस्वार्थ और निर्दोष-भाव से मिल कर हितकारी सिद्ध हो सकता है। विश्वासआस्थाश्रद्धासराहना से रहित व्यक्ति का खिन्न असंतुष्ट और व्यग्र रहना स्वाभाविक ही हैजैसा कि दोष-दर्शी रहता भी है।
🔴 यदि आपको अपने अन्दर इस प्रकार की दुर्बलता दिखी हो तो तुरन्त ही उसे निकालने के लिए और उसके स्थान पर गुण-ग्राहकता का गुण विकसित कीजिये। इस दशा में आपको हर व्यक्तिवस्तु और वातावरण में आनंदप्रशंसा अथवा विनोद की कुछ-न-कुछ सामग्री मिल ही जायेगी। दूसरों के गुण-दोषों में से उस हंस की तरह केवल गुण ही ग्रहण कर सकेंगेजोकि पानी मिले हुए दूध में से केवल दूध-दूध ही ग्रहण कर लेता है और पानी छोड़ देता है।
🔵 दूसरों की अच्छाइयों को खोजने,उनको देख-देख प्रसन्न होने और उनकी सराहना करने का स्वभाव यदि अपने अन्दर विकसित कर लिया जाये तो आज दोष-दर्शन के कारण जो संसारजो वस्तु और जो व्यक्ति हमें काँटे की तरह चुभते हैंवे फूल की तरह प्यारे लगने लगें। जिस दिन यह दुनिया हमें प्यारी लगने लगेगीइसमें दोष,दुर्गुण कम दिखाई देंगेउस दिन हमारे हृदय से द्वेष एवं घृणा का भाव निकल जायेगा और हमें हर दिशा और हर वातावरण में प्रसन्नता ही आने लगेगी।दुःखक्लेश और क्षोभरोष का कोई कारण ही शेष न रह जायेगा।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य🌹 अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 24 





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