Monday, February 6, 2017

एकादशी

*एकादशी-मंगलवार,7 फ़रवरी*

सभी वैदिक शास्त्र एकादशी के दिन पूर्ण रूप से उपवास *(जल, कन्द,दूध एवम् फल)* करने की दृढ़ता से अनुशंसा करते हैं।

आध्यात्मिक प्रगति के लिए आयु आठ से अस्सी तक के हर किसी को वर्ण आश्रम, लिंग भेद या और किसी भौतिक वैचारिकता की अपेक्षा कर के एकादशी के दिन व्रत करने की अनुशंसा की गयी है। वे लोग जो पूर्ण रूप से उपवास नहीं कर सकते उनके लिए मध्याह्न या संध्या काल में एक बार *एकादशी व्रत का प्रसाद करने* की भी अनुशंसा की गयी हैं। परन्तु इस दिन किसी भी रूप में किसी को भी किसी भी स्थिति में अन्न या चावल नहीं ग्रहण करना चाहिये।

*एकादशी* को उसके सभी लाभों के साथ ऐसा उपाय या साधन समझना चाहिये जो सभी जीवों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक हैं।

भगवान् की कृपा से यह दिन भगवान् की भक्तिमयी सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक बन गया है।

पापमयी इच्छाओं से मुक्त हो एक भक्त *विशुद्ध भक्तिमयी* सेवा कर सकता है और ईश्वर का कृपापात्र बन सकता है।

 इसलिए,भक्तों के लिए, एकादशी के दिन व्रत करना साधना-भक्ति के मार्ग में प्रगति करने का माध्यम है।

व्रत करने की क्रिया चेतना का शुद्धिकरण करती है और भक्त को कितने ही भौतिक विचारों से मुक्त करती है। क्योंकि इस दिन की गई भक्तिमयी सेवा का लाभ किसी और दिन की गई सेवा से कई गुना अधिक होता है। इस लिए भक्त जितना अधिक से अधिक हो सके *एकादशी के दिन जप, कीर्तन, भगवान की लीला संस्मरण पर चर्चाएँ आदि अन्य भक्तिमयी सेवाएं किया करते हैं।*

इस दिन कम से कम 64 जप माला संख्या पूरी करने, भगवान् के लीला संस्मरणों को पढ़ने एवं भौतिक कार्यकलापों में न्यूनतम संलग्न होने की अनुशंसा की है। हालाँकि, वे भक्त जो पहले से ही भगवान् की भक्ति की सेवाओं (जैसे पुस्तक वितरण, प्रवचन आदि) में सक्रियता से लगे हुए हैं उनके लिए उन्होंने कुछ छूट दी हैं।जैसे उन खाद्यों को वे इस दिन भी खा या पी सकते है जिनमे अन्न नहीं हैं।

*पहले इस लिए यह लेख लिखा, ताकि आप इस एकादशी को व्रत का संकल्प ले सकें और प्रिया लाल जी की प्रसन्नता और कृपा प्राप्त कर सकें।*

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