#चौहान_राजपूत
मनीषा सिंह की कलम से संसार एक सागर है, जिसमें अनंत लहरें उठती रहती हैं। ये लहरें कितने ही लोगों के लिए काल बन जाती हैं, तो कुछ ऐसे शूरवीर भी होते हैं जो इन लहरों से ही खेलते हैं और खेलते-खेलते लहरों को अपनी स्वर लहरियों पर नचाने भी लगते हैं। ऐसा संयोग इतिहास के दुर्लभतम क्षणों में ही देखने को मिलता है। कुछ लोग मिट्टी में से उठते हैं, और मिट्टी में ही मिल जाते हैं, पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मिट्टी को सोना बना देते हैं और उसे इतिहास में गौरव का स्थान दिलाने में सफल हो जाते हैं। कुछ लोग काल के सांचे में ढल जाते हैं, तो कुछ काल के सांचों को ही बदल जाते हैं।
पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज सन ११०५ – ११३० ईस्वी तक शासन किया जिन्हें अजयदेव एवं सल्हाना के नाम से भी जाने जाते हैं राजा अजयदेव चौहान ने ही (1100) ११०० ई. में अजमेर नगर की स्थापना की थी। अजयदेव को 'अजयराज चौहान' कहकर भी कई स्थानों पर सम्बोधित किया गया है । यह सम्भव है कि पुष्कर अथवा अनासागर झील के निकट होने के कारण ही अजयदेव ने अपनी राजधानी का नाम 'अजयमेरु' ('मेर' –झील ) रखा हो । अजयदेव चौहान ने तारागढ़ की पहाड़ी पर एक क़िला 'गढ़-बिटली' नाम से बनवाया था, जिसे कर्नल टॉड ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ में "राजपूताने की कुँजी" कहा है । अजमेर की स्थापना चौहान वंश के राजा अजयराज चौहान ने गढ़ अजयमेरू के नाम से शुक्ल प्रतिपदा के प्रथम दिन की थी । विख्यात चौहान नरेश अजयराज चौहान के नाम पर चारण-भाट इसे 'अजयमेरु' और क़िले को 'अजयमेरु दुर्ग' कहने लगे थे।
पृथ्वीराजविजया एवं बिजोलिया शिलालेख में गजनी की मुस्लिम आक्रमणकारियों पर विजय पाने पर महाराजा अजयराज को विशेष प्रसिद्ध माना गया हैं इन दो भारतीय ग्रंथो के अलावा विदेशी ग्रन्थ तबक़ात-ए-नासिरी एवं तारीख-ए-फिरीश्ता ने भी चौहान राजा अजयराज एवं गजनी के मुस्लिम सेना के मध्य युद्ध का वर्णन मिलता हैं – “ ग़जनी का शासक बहराम शाह ने भारतवर्ष पर आक्रमण करने के लिए सेनापति नियुक्त किया ।“ ग़जनी ने अपने सेना के साथ नागौर पर आक्रमण किया था प्रभावाकाचरिता के अनुसार उस समय नागौर राज्य राजा अजयराज के साम्राज्य का हिस्सा था ।
भारतीय एवं विदेशी इतिहासकारों ने इस बात की पुष्टिकरण किया की अजयराज शाकंभरी (साँभर) के चौहानवंश नरेश ने तुर्क , बगदादी , ख़्वारेज़्म साम्राज्य के आक्रमणकारियों को भारतवर्ष से खदेड़ा था एवं गज़नी शासक बहराम शाह के खिलाफ सफल युद्ध अभियान के द्वारा भारतवर्ष को गजनी शासक के हाथो से मुक्त करवाया था ।
दोबार तुर्क हमलावरों को खदेड़ा था अजयराज चौहान ने जिसके पश्चात तुर्क हमलवारो ने अलग अलग साम्राज्य के सुल्तानों को साथ लेकर संयुक्त युद्ध अभियान किया ।
अजयराज चौहान इतिहास के प्रथम एवं अंतिम शासक थे जिनके खिलाफ तीन देशो के अलग अलग साम्राज्य के सुल्तानों ने संयुक्त युद्ध अभियान किया जिसमे तुर्क हमलावर सेल्जुक साम्राज्य के सुल्तान गीयाथ- अल- दीन महमूद प्रथम, अब्बासिद साम्राज्य बगदाद के खलीफ़ा अल-अर्शिद , ख़्वारेज़्म साम्राज्य के सुल्तान क़ुतुब-अद-दीन-मुहम्मद प्रथम था । सन १११० में लवपुरा (वर्त्तमान लाहौर) में हुआ था संयुक्त युद्ध अभियान में एक से दो लाख मलेच्छ हमलावरों की सेना थी दूसरी तरफ अजयराज चौहान ने एकछत्र शासन स्थापित करने हेतु जिन जिन राज्य पर विजय पाया था उन पड़ोसी राज्यों के राजा भी अजयराज चौहान की सहायता के लिए रणभूमि में अपनी सेना भेजी (कुछ मुर्ख इतिहासकार कट्टर हिन्दू का चोला पहने हमेसा यह जताते हैं हिन्दू कभी एक नही हुआ एक नही हुआ होता तो भारतवर्ष अखंड नही रहता) सम्राट अजयराज चौहान महापराक्रमी योद्धा थे इन्होने इस युद्ध में मलेच्छ हमलावरों को भारतवर्ष से खदेड़ा था । जहा गदारो ने अपने राजाओ की इतिहास लिखने में गद्दारी किया वही विदेशी लेखको ने न्याय किया Henry Cousens ने अपनी किताब Military History of Invaders में पृष्ठ 48-55 में इस युद्ध को ख़ास स्थान दिया गया हैं इस युद्ध का वर्णन करते हुए अजयराज चौहान को “Safeguard Wall of India” अजयराज चौहान भारतमाता के लिए रक्षा की दिवार थे एवं उनकी तलवार और उनकी बाहुबल कवच थे । दो बार तुर्क हमलावर अजयराज चौहान से परास्त होने के कारण तीसरी बार अकेले युद्ध करने का साहस नही किया जिस करण तीन साम्राज्य के सुल्तानों के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण किया एवं दो लाख की सेना अजयराज चौहान की पराक्रम एवं रणनीति के आगे धराशायी होगये थे । सम्राट अजयराज के तलवारों को कई इतिहासकारों ने जैसे (Jordens Benito ने अपने किताब Ends of Invasions “12th centuries Asia’s ruler of Chahmana Dynasty’s swords took the title of Invaders Slaughter Machine”) अर्थात मलेच्छ वध का यन्त्र कहा हैं (ऐसे इतिहास को मुग़लिया हरम में पले इतिहासकारों ने नही लिखा कैसे लिखते अगर लिखते तो उनके बैंक खाते में अंग्रेजी डॉलर आने बंद होजाते)
Battle of Nagaur (नागौर युद्ध) सन १११८ -:
बहराम शाह ने अपने सेनापति शाहब-उद-दीन को भाड़ी संख्या की सेना के साथ (ग़जनी सेना की संख्या लाखों में हुआ करती थी भिन्न मत हैं इतिहासकारों की कोई कहा तीन लाख तो कोई पांच लाख तो कोई एक लाख अलग अलग इतिहासकारों से अलग अलग संख्याओं की व्याख्यान मिला दुविधा के करण सेना की संख्या यहाँ नही लिख पायी परन्तु यह तय था सेना लाखो की संख्या में थी ) नागौर राज्य पर आक्रमण किया था । नागौर अजयराज के साम्राज्य का हिस्सा था अजयराज अपनी सेना के साथ घेराबंदी बनाये नागौर सीमा पर खड़े थे गजनी शासक के सेनापति शाहब-उद-दीन ने चौहान सम्राट अजयराज को चेतावनी दिया की वो बहराम शाह की आधीनता स्वीकार कर राजकोष कि धन संपत्ति गजनी शासक को मुवाज़े के तौर पर देने के लिए कहा , परन्तु अजयराज ने शांतिवार्ता ठुकराते हुए युद्धभूमि में लड़ने का आह्वान किया कहा “नागौर को जितना हैं एवं नागौर की धन संपत्ति पर अधिकार करना हैं तो रण में हमे परास्त करना होगा” उसने बड़ी बुद्घिमत्ता से कार्य किया और अपनी सेना की घोड़े की नाल के आकार की व्यूह रचना की जिससे शत्रु सेना का सफाया करने में तथा उसके अहंकार को तोडऩे में उसे सफलता ही मिली । अपने सेना में चेतना भड़ते हुए हुँकार भड़ा एवं लाखों की तादात में आये गजनी की सेना पर टूट परा विजय या वीरगति का लक्ष्य साधे अजयराज काल रूप धारण कर मलेच्छों का संघार करने लगे । तबक़ात-ए-नासिरी vol. III के अनुसार गजनी को भाड़ी नुक्सान उठाना पड़ा इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध हुआ जहाँ गजनी सेना का एक भी सैनिक जीवित नही बचा सेनापति शाहब-उद-दीन भी अजयराज के हाथो मारा गया । अजयराज एक अत्यंत कुशल और दुर्दशिय राजा था जिन्होंने अपने शत्रु को कभी जीवित नही जाने दिया संभवत यही मुख्या करण था बहराम शाह कभी स्वयं अजयराज से युद्ध नही किया उसने अपने सेनापतियो भेजकर युद्ध किया । संदर्भ-: तबक़ात-ए-नासिरी vol. III मिन्हाज-ए-सिराज , प्रभावकाचरिता , Early Chauhān Dynasties Dasharatha Sharma (1959)
(The Prithviraja-Vijaya states that Ajayaraja defeated the Garjana Matangas thrice("Ghazna Muslims").The Prabandha Kosha also claims that Ajayaraja defeated "Sahavadina" (Sanskritized form of Shahab-ud-Din). This probably refers to his repulsion of invasions by Ghaznavid generals. The 13th century Muslim historian Minhaj-i-Siraj states that the Ghaznavid ruler Bahram Shah made several expeditions to India during this time.)
पृथ्वीराजविजया के अनुसार अजयराज चौहान ने तीन बार ग़जनी के मुस्लिम सेना को परास्त किया अजयराज चौहान ने ग़जनी के शासक बहराम शाह द्वारा भेजे गये सैन्यबल की सैन्य संचालन मुहम्मद बहलिम नामक सेनापति कर रहा था ग़जनी । सत्यपूर (वर्त्तमान सांचोर ( जालोर )) नामक स्थान पर सन १११९ युद्ध हुआ था अजयराज चौहान एक महावीर योद्धा था जिन्होंने तुर्कों को कई बार खदेड़ा था इनसे मलेच्छ सेना कांपती थी ग़जनी परास्त होने के बाद अगली बार जब आक्रमण करता था तीन गुणा अधिक सैन्यबल के साथ आक्रमण किया सम्राट अजयराज ने फसल नष्ट करवा दिया यह एक रणनीति होती हैं जिससे शत्रु सेना कुछ भी अनाज का सेवन ना कर पायें युद्ध कई दिनों तक चलता था और राशन पर्याप्त नही होता था क्योंकि मुस्लिम सेना लूटमार कर भागने के इरादे से आते थे जिस वजह से राशन अपने साथ नही लाते थे परन्तु युद्ध में भी अगर जाते थे तो जिस राज्य पर आक्रमण करते थे वह के फसल को पका कर खाते थे । यह युद्ध 9 दिवसीय युद्ध था अजयराज चौहान ने अति उतम रणनीति का प्रयोग किया अस पास के फसल को नष्ट करवा दिया घोड़ो के लिए घांस तक खाने को नही छोड़ा । मुहम्मद बहलिम की सेना संख्या में भले ही विशाल सेना थी परन्तु अजयराज के पास बुद्धिमत्तापूर्ण रणनीति था साथ ही चौहान वंश भूजाबल के लिए तो विख्यात थे ही । भीषण युद्ध हुआ इस युद्ध में अजयराज चौहान की रणनीति काम कर गयी एवं लम्बी युद्ध चली नौ दिवसीय जिससे मुहम्मद बहलिम ने आत्मसमर्पण कर भाग खड़ा हुआ । साम , दाम , दंड , वेद का प्रयोग किया अजयराज चौहान की हर योजना सफल सिद्ध हो रही थी और शत्रु अपने ही बुने जाल में फंसकर रह गया था। सत्यपुर की ओर बढ़ते मुहम्मद बहलिम को सत्यपुर ग़जनी से चाहे भले ही दूर ना लगा हो पर अब सत्यपुर से ग़जनी तो इतनी दूर लग रहा था कि संभवत: वह पूरे जन्म भागकर भी उसकी दूरी को नाप न सकेगा। कहा जाता हैं मुहम्मद बहलिम के इस हार के बाद उन्हें बंदी बना लिया जाता हैं बहराम शाह द्वारा । सम्राट अजयराज चौहान की प्रशंसा में यहां जितना लिखा जाए उतना कम है। क्योंकि उसकी देशभक्ति ने समकालीन इतिहास के पृष्ठों पर जिस प्रकार रोमांच और उत्साह का गुलाल छिड़का है उससे हमारे वीरों के ‘वसंत मनाने’ की वास्तविक परिपाटी और वास्तविक उद्देश्य का ज्ञान होता है।
सन ११२१ में Battle of KasyapaPura (वर्त्तमान मुल्तान)
तृतीय युद्ध ग़जनी शासक बहराम शाह ने सालर हुसैन को नागौर विजय के लिए भेजा था अजयराज चौहान के गुप्तचरों ने उन्हें पहले से सावधान कर दिया था अजयराज चौहान ने बुद्धि एवं पराक्रम का अद्भुत उदाहरण पेश किया कश्यप-पुरा (मुल्तान) एवं सिन्धु नदी के सीमारेखा पर चौहान सेना दीवार बन के खड़ा था सालर हुसैन को इस बात की उपेक्षा नही थी की राजपूत सेना कश्यप-पुरा (मुल्तान) एवं सिन्धु नदी की सीमारेखा पर रक्षा कवच बने खड़े होंगे ग़जनी की सेना को संभालने का मौका तक नही मिला राजपूत सेना ने तीरों की बौछारें करने लग गये जिससे ग़जनी की सेना तितर बितर होगया इससे पहले की सालर हुसैन कुछ समझ पाते सालर हुसैन की समंदर जितना विशाल सेना आधा से ज्यादा राजपूत सेना की तीरों की बौछार से ख़तम होगये थे और आधी सेना को राजपूत सम्राट अजयराज चौहान की २५,००० पैदल सैन्यबल काल बनकर निगल गये सालर हुसैन की मृत्यु अजयराज चौहान के हाथो हुआ सालर हुसैन को परास्त कर कम्बोज (वर्त्तमान काबुल) पर आक्रमण कर कम्बोज से गजनी का शासक बहराम शाह को खदेड़ा । बहराम शाह ने खुद लिखा था “अजयराज चौहान की वजह से दिल्ली का तख्त ही नही सम्पूर्ण भारतवर्ष उनके हाथ से निकल गया था” Reference-: Period of Ghaznavids C.E. Bosworth Page-: 120
कुछ इतिहासकारों के अनुसार राजपूतो ने ग़जनी पर वापस अपना आधिपत्यं स्थापित कर लिया था और इतिहासकार लेविट डुसों (Lewitt Duson) Rajputana Ruler of Centuries के अनुसार अजयराज चौहान का शासन था ग़जनी पर परन्तु इस विषय में ज्यादा तथ्य ना मिलने के करण दावे के साथ कुछ नही कह सकती ।
महाराजा अजयराज जी ने उम्र के आखिरी पङाव मे राज-काज छोड़ प्रभु भक्ति कि तरफ मुंह किया और योगी हो गए । उस जमाने में राजपूत जब इस उम्र में घर त्याग करते तो अपना घोड़ा व तलवार साथ रखते थे और सफेद वस्त्र धारण कर एकांत वास को चले जाते थे ।।
अजयराज चौहान को केवल अजयमेरु शहर के निर्माण के लिए जाना जाता हैं परन्तु कोई भी इतिहासकार जो भारत के सच्चे इतिहास का लेखन करते हैं उनमे से किसी ने भी सत्य को नही लिखा यहाँ तक राजपूत इतिहासकार भी चुक गये दशरथ शर्मा एवं मिन्हाज-ए-नसीरी , तारीख-ए-फिरीश्ता , पृथ्वीराजविजया , प्रबंधकोश के अलावा कही और नही मिलता हैं । अजयराज चौहान के सहशक्त राजा थे इन्होने साम्राज्य विस्तार के अलवा ग़जनी शासक के नागौर आक्रमण के बाद उन्होंने दूरदर्शिता से काम लेते हुए भारतवर्ष की सीमारेखा पर मजबूत सुरक्षाकवच का निर्माण किया । अजयराज को अपराजे सम्राट कहना कदापि गलत नही होगा बारहवीं सताब्दी जब भारत पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे थे मलेच्छ हमलावरों का उसवक्त अजयराज ने इन विदेशी आक्रमणकारियों का दमन कर भारत को मुक्त करवाया था । वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ऐसे अप्रतिम योद्धा के कृतियों को नज़रंदाज़ करने का फल आज हम सब भुगत रहे हैं भारत में अकबर , तैमुर , गोरी पैदा हो रहे हैं परन्तु हिन्दुओं में कोई अजयराज चौहान , वाक्पतिराज , पृथ्वीराज चौहान , महाराणा प्रताप , लक्ष्मीबाई , रानी कुरमदेवी जन्म नही ले पा रही हैं ।
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