Thursday, February 16, 2017

"चलते रहे कदम तो,

"चलते रहे कदम तो,
              किनारा जरुर मिलेगा !!
अन्धकार से लड़ते रहो,
              सवेरा जरुर खिलेगा !!
जब ठान लिया मंजिल पर जाना,
              रास्ता जरुर मिलेगा !!
ए राही न थक, चल...
              एक दिन समय जरुर फिरेगा !

🌹"निंदा" से घबराकर अपने "लक्ष्य" को ना छोड़े  क्योंकि...."लक्ष्य" मिलते ही निंदा करने वालों की "राय" बदल जाती है।🌹
           🙏सुप्रभात🙏

Wednesday, February 15, 2017

नर से नारायण बनने का परम पुरुषार्थ

👉 नर से नारायण बनने का परम पुरुषार्थ

👉 नर से नारायण बनने का परम पुरुषार्थ

🔵 ईश्वर प्राप्ति को जीवन का परम पुरुषार्थ कहा गया है। महान् के साथ तुच्छ की घनिष्ठता स्थापित होने पर लाभ ही लाभ है। इस प्रक्रिया के आधार पर नगण्य को भी महान् बनने का अवसर मिलता है। नालागंगा में मिलकर उसी का नाम धारण कर लेता है। बूँद का विसर्जन उसे विराट् सागर बना देता है। उपेक्षणीय ईंधन देखते-देखते प्रचण्ड अग्नि का रूप धारण कर लेता है। पाणिग्रहण करने के उपरान्त पत्नी तत्काल अपने पति की समस्त सम्पदा पर सहज अधिकार प्राप्त कर लेती है। वृक्ष से लिपट कर दुबली कमर वाली बेल भी उतनी ही ऊँची उठ जाती है। वादक होठों से सटने पर पोले बाँस की नली को मनमोहक वंशी के रूप में श्रेय सम्मान मिलता है। कठपुतली का नाच वस्तुतः उन लकड़ी के टुकड़ों का कलाकार की अँगुलियों के साथ समर्पित भाव से बँध जाने के अतिरिक्त और कुछ है नहीं।
🔴 ऊँचे तालाब और नीचे तालाब के बीच एक सम्बन्ध स्थापित करने वाली नाली बना दी जायतो दोनों की सतह एक होने तक ऊँचे का प्रवाह नीचे की ओर बहता रहेगा। जेनरेटर के साथ सम्बन्ध सूत्र स्थापित होते ही बल्बपंखे आदि उपकरण तत्काल गतिशील होते हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि परमात्मसत्ता के साथ घनिष्टता स्थापित करने वाले भगवद् भक्त क्यों कर देवात्मा माने गयेकिस कारण अपना और समस्त संसार का कल्याण कर सकने में समर्थ हुएप्रगति का उच्चतम सोपान यही है कि आत्मा-परमात्मा के स्तर तक जा पहुँचे और सर्वोत्कृष्ट शिखर पर अवस्थित होकर दूसरों के व अपने बीच का आकाश-पाताल जैसा अन्तर देखे।
🔵 प्रगति यदि किसी को सचमुच ही अभीष्ट है तो उसे बहिरंग के वैभव में नहींअन्तरंग के वर्चस् में तलाशा जाना चाहिए। एक ही उपाय का अवलम्बन लिया जाना चाहिए-महानता के साथ अपनी क्षुद्रता को जोड़ देना। कामना का भावना मेंसंकीर्णता का व्यापकता मेंनर का नारायण में विलय-विसर्जन उसी परम पुरुषार्थ का सुनिश्चित स्वरूप हैजिसे ईश्वर प्राप्ति कहते हैं जिसे पा लेने के बाद फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या 🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 16

जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा ही ‘मोक्ष’

👉 जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा ही ‘मोक्ष’

🔵 मोक्ष क्या हैमुक्ति क्या हैयह प्रश्न हर भारतीय संस्कृति के पक्षधर मानव के मन में सहज ही उठता रहा हैसदा से हीउसके पृथ्वी आविर्भाव के काल से। कई व्यक्ति यह समझते हैं मोक्ष मरने के बादशरीर रूपी बंधन के छूटने के बाद ही मिलता है। इसके लिए वे दान-पुण्य आदि अनेकानेक कृत्य करते भी देखे जाते हैं। किन्तु क्या वास्तविक मोक्ष इससे मिल जाता हैऋषियों की दृष्टि से देखें तो यह एक ऐसी विधा है जिसका अन्तर्चक्षुओं से साक्षात्कार कर समझना होगा।

🔴 ऋषि- मनीषा कहती है कि जो मोह का क्षय करेवही मोक्ष है। यह सदेह जीवन मुक्त स्थिति किसी को भी प्रयास करने पर मिल सकता है। मोक्ष वस्तुतः जीवन में त्याग की प्रतिष्ठा का नाम है। वासना-तृष्णा-अहंता रूपी त्रिविध बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर आत्मतत्त्व की ओर उन्मुख होने का पुरुषार्थ ही मोक्ष है। इस मोक्ष देने वाले ज्ञान का स्वरूप भारतीय दर्शन की विभिन्न विचार धाराओं के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है,किन्तु लक्ष्य सभी का एक है-जीव को बंधनों से मुक्त करना। वस्तुतः मानव जीवन मिला ही इसलिए है कि हर व्यक्ति इस परम पुरुषार्थजिसे निर्वाण मुक्ति या अपवर्ग कुछ भी नाम दे देंके लिए कर्म कर व परमतत्त्व की प्राप्ति हेतु इस प्रयोग को सार्थक बनाए। मोक्ष प्राप्ति हेतु किये जाने वाले इस कर्म को यदि जीवन जीने की कला कहा जाय तो अत्युक्ति नहीं होगी।

🔵 गीता में योगेश्वर कृष्णइस कला का जिसमें बंधनमुक्ति या मोक्ष प्राप्ति का सन्देश दिया गया हैबड़ा ही सुन्दर शिक्षण धनञ्जय को देते हैं। मोक्ष को गीताकार जीवन के एक सकारात्मक पक्ष के रूप में लेता है। कर्म करते हुए व उन कर्मों को मन से परम सत्ता को अर्पण करते हुए यदि कोई पुरुषार्थ करता है (मयि सन्यस्य मत्परः) तो वह मोक्ष इस जीवन में ही पा लेता है। कर्म करते हुए व्यक्ति को अनेकानेक बन्धनों को काटना पड़ता है,जिनमें लोभ प्रधानमोह प्रधान व अहं प्रधान ये तीन प्रमुख है। बन्धन सदा दुष्प्रवृत्तियों के ही होते हैं। इनसे छुटकारा पा लेनाज्ञान द्वारा भवबन्धनों से मुक्ति पा लेना ही मोक्ष है। यदि यह दूरदर्शिता हमारे अन्दर आ जाए तो मोक्ष का तत्त्वज्ञान समझते हुए हम जीवन को सफलता की चरमसीमा तक पहुँचा सकते हैं। यह मार्ग ऋतम्भरा प्रज्ञा के आश्रय के रूप में प्रत्येक के लिए खुला है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 15

गहना कर्मणो गतिः

👉 गहना कर्मणो गतिः

👉 गहना कर्मणो गतिः


🔵 वेद में ऋषि कहते हैं-‘‘उत्थानं ते पुरुष नावयानम्’’ अर्थात् हे जीव! तुझे उठना है,नीचे नहीं गिरना है। मानव योनि में आकर तो तू ‘स्व’ की गरिमा को पहचान व स्वयं को ऊँचा उठा। ‘‘कितने हैं जो इस मर्म को समझ पाते हैं कि मनुष्य जीवन हमें अपने पशुत्व को उभारने के लिए नहींदेवत्व को विकसित करने के लिए मिला है। कर्मों की श्रेष्ठता द्वारा मनुष्य निश्चित ही उस पुल को पार कर सकता है जो देवत्व एवं पशुत्व के बीच बना सेतु अनन्तकाल से हम सबकी प्रगति की यात्रा का राज मार्ग बना हुआ है। इस पुल तक पहुँचनादेवत्व को पहचानना व फिर उस यात्रा पर चल पड़ना जिनसे भी सम्भव हो पाता हैवे सभी विवेकशीलदूरदर्शी देवमानव कहे जाते हैं।’’

🔴 गीताकार के अनुसार किसी भी काल में क्षणमात्र भी कोई कर्म किए बिना रह नहीं सकता। भगवान् स्वयं कहते हैं कि यदि वे भी एक क्षण कर्म करना बन्द कर दें तो सारा विश्व नष्ट हो जाय। सारा लोक व्यवहार नष्ट हो जाए। कर्म करते रहनाकर्त्तव्यपरायण बने रह कर मनुष्य जीवन को सतत् प्रगति की ओरदेवत्व की ओर बढ़ाते चलना ही मनुष्य की सहज नियति है। यह बात अलग है कि कर्म का स्वरूप जाने बिना जब मनुष्य अशुभ कर्मों मेंअकर्मोंविकर्मों में निरत हो जाता है तो वह जीवन यात्रा को चलाते हुए भी पतन की ओर ही जाता देखा जाता है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं ‘‘कर्म क्या है,अकर्म क्या है इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रम में पड़ जाते हैं,इसीलिए सभी को कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिएअकर्म का भीविकर्म का भीक्योंकि कर्म की गति गहन है।’’ (गहना कर्मणो गतिः)

🔵 अकर्म उन्हें कहा जाता है जिन्हें न करने से पुण्य तो नहीं होताकिन्तु किये जाने पर पाप लगता है। विकर्म उन्हें कहते हैं जो परिस्थिति विशेष के अनुसार वास्तविक रूप से कुछ अलग स्वरूप ले चुके हैं तथा निषिद्ध कर्म बन गए हैंयथा कुपात्र को दान देना। कर्म में अकर्म तथा अकर्म में कर्म देखने का नीर-क्षीर विवेक पैदा करने के लिए गीताकार मार्गदर्शन करता हुआ कहता है कि मनुष्य को यज्ञ के निमित्त किये जाने वाले कर्मों को बिना किसी आसक्ति के करते रहना चाहिए तो फिर भटकने की कोई संभावना नहीं है। यज्ञ के निमित्त अर्थात् परमार्थ प्रयोजनों के लिए। जो भी कर्म इस भाव से किये जायेंगे वे सत्कर्म कहलायेंगे व बन्धनों से परे व्यक्ति को जीवन्मुक्ति की ओर ले जायेंगे। हम इस छोटे से तत्त्वदर्शन को समझ लें कि परमार्थ में ही स्वार्थ है तो दुनिया के माया-जंजाल सेभवबन्धनों से मुक्ति सहज ही मिल सकती है।

🌹 डॉ प्रणव पंड्या 
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 14

👉 आस्तिकता का यथार्थ


👉 आस्तिकता का यथार्थ

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 आस्तिकता का यथार्थ
🔵 आम लोगों की सामान्य धारणा यही है कि भगवान् मोर-मुकुट धारी रूप में होते हैं व समय-समय पर पाप बढ़ने पर पौराणिक प्रस्तुति के अनुसार वे उसी रूप में आकर राक्षसों से मोर्चा लेते व धर्म की स्थापना करते हैं। बहिरंग के पूजा कृत्यों से उनका प्रसन्न होना व इस कारण उतने भर को धर्म माननायह एक जन-जन की मान्यता है व इसी कारण कई प्रकार के भटकाव भरे धर्म के दिखाने वाले क्रिया-कलाप अपनी इस धरती पर दिखाई देते हैं। जोरों से आरती गाई जाती हैनगाड़े-शंख आदि बजाए जाते हैंएवं चरणों पर मिष्ठान्न के ढेर लगा दिए जाते हैं। सवा रूपये व चंद अनुष्ठानों के बदले भी उनकी अनुकम्पा खरीदने के दावे किये जाते हैं। प्रश्न यह उठता है कि आस्तिकता के बढ़ने का क्या यही पैमाना है जो आज बहिर्जगत् में हमें दिखाई दे रहा है?विवेकशीलता कहती है कि ‘‘नहीं’’।
🔴 ईश्वर विश्वास तब बढ़ता हुआ मानना चाहिए जब समाज में जन-जन में आत्मविश्वास बढ़ता हुआ दिखाई पड़े।आत्मावलंबन की प्रवृत्ति एवं श्रमशीलता की आराधना से विश्वास अभिव्यक्त होता दीखने लगे। आस्तिकता संवर्धन तब होता हुआ मानना चाहिए जब एक दूसरे के प्रति प्यार-करुणा-ममत्व के बढ़ने के मानव मात्र के प्रति पीड़ा की अनुभूति के प्रकरण अधिकाधिक दिखाई देने लगें एवं वस्तुतः समाज के एक-एक घटक में ईश्वरीय आस्था परिलक्षित होने लगे।कोई भी अभावग्रस्त हो एवं अपना अन्तःकरण उसे ऊँचा उठाने के लिए छलछला उठे तो समझना चाहिए कि वास्तव में भगवत् सत्ता वहाँ विद्यमान है। 
🔵 अनीति-शोषण होता हुआ देखकर भी यदि कहीं किसी के मन में किसी की सहायता का आक्रोश नहीं उपज रहा है तो मानना चाहिए कि बहिरंग का आस्तिक यह समुदाय अभी अन्दर से उतना ही दिवालियाभीरु व नास्तिक है। जब ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास बढ़ने लगता हैतो देखते-देखते लोगों के आत्मबलों में अभिवृद्धिसंवेदना की अनुभूति के स्तर में परिवर्तन तथा सदाशयता का जागरण एक सामूहिक प्रक्रिया के रूप में चहुँ ओर होता दीखायी पड़ने लगता है।
🔴 आज का समय ईश्वरीय सत्ता के इसी रूप के प्रकटीकरण का समय है। प्रसुप्त संवेदनाओं का जागरण ही भगवत् सत्ता का अन्तस् में अवतरण है। आस्था संकट की विभीषिका इसी से मिटेगी व यही आस्तिकता का संवर्धन कर जन-जन के मनों के सन्ताप को मिटाएगी। हमें इसी प्रज्ञावतार को आराध्य मानकर अपने क्रियाकलाप तदनुरूप ही नियोजित करने चाहिए।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या 🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 13

👉 सफलता के मणिमुक्तक पाएँ, तो कैसे?

👉 सफलता के मणिमुक्तक पाएँ, तो कैसे?

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 सफलता के मणिमुक्तक पाएँतो कैसे?
🔵 सफलता पानी है तो उसके लिए प्रबल संकल्प शक्ति तथा सतत् अध्यवसाय एक अनिवार्य शर्त है। स्वतः हम हर कार्य में सफल होते चले जाएँगेकोई दैवी अनुकम्पा किसी के आशीर्वाद सेकुछ तन्त्र-मन्त्र-कर्मकाण्डादि से हम पर  बरसती चली जाएगीयह आशा करना तो शेखचिल्ली का सपना भर है। सफलता के मणिमुक्तक यूँ ही धूल में बिखरे हुए नहीं पड़े हैं। उन्हें पाने के लिए गहरे में उतरने की हिम्मत इकट्टी करनी होगीकठोर परिश्रम करने व करते रहने की शपथ लेनी होगी। कठोर,दमतोड़ और टपकते स्वेद कणों वाला परिश्रम ही जीवन का सबसे श्रेष्ठ उपहार है। इसी के फलस्वरूप लौकिक जीवन की समस्त सफलताओं-विभूतियों को पाया जा सकता है।
🔴 सुअवसर की प्रतीक्षा में बैठे रहनाकुछ न कर काहिली में उपलब्ध समय रूपी सम्पदा को गँवा बैठना तो मानव जीवन की सबसे बड़ी मूर्खता है। उद्यम के लिए हर घड़ी हरपल एक शुभ मुहूर्त हैसुअवसर है। सस्ती सफलता-शीघ्र सिद्धि प्राप्त करने की ललक के फेर में पड़े रहने से वस्तुतः कुछ भी लाभ नहीं। कुण्डलीफलित ज्योतिष-सर्वार्थ सिद्धि योग आदि में समयक्षेप अवसर चूक जाने के बाद काफी फछतावा देता है। चिरस्थायी प्रगति के लिए राजमार्ग पर अनवरत परिश्रम और अपराजेय साहस को साथ लेकर चलना होगा।
🔵 पगडण्डियाँ या ‘‘शार्टकट’’ ढूँढ़ना बेकार है। वे भटका सकती हैं। जिनने भी कुछ सफलता पायी हैजिसे इतिहास में लिखा गयाउन्हें गहराई तक खोदने व उतरने के लिए कटिबद्ध होना पड़ा है। विजय श्री का वरण करने के लिए कमर कसनाआस्तीन चढ़ाना और खोदने की प्रक्रिया आरम्भ कर देना आवश्यक हैपर ध्यान यह भी रखा जाना चाहिए कि अनावश्यक उतावली से कहीं कुदाली से पैर ही न कट जायँ।
🔴 परिस्थितियाँसाधन एवं क्षमता का समन्वय करके आगे बढ़ना ही समझदारी है।यही सफलता के लिए अपनायी गयी सही रीति-नीति हैकिन्तु यह तथ्य गाँठ बाँध लिया जाना चाहिए कि सफलता केवल समझदारी पर ही तो निर्भर नहीं हैउसका मूल्य माथे से टपकने वाले श्रम-सीकरों से ही चुकाना पड़ता है।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या 🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 12

👉 हम अपने भीतर झाँक ना सीखें


👉 हम अपने भीतर झाँक ना सीखें
 🔵 व्यक्ति दूसरों के विषय में अधिकाधिक जानने का प्रयास करे अथवा उनकी भावनाओं से परिचित होना चाहेउससे पहले अपने विषय में अधिकाधिक जान लेना चाहिए। अपने मन की भाषा को,आकांक्षाओं को-भावनाओं को बहुत स्पष्ट रूप से समझासुना और परखा जा सकता है। अपने बारे में जानकर अपनी सेवा करना,आत्म सुधार करना अधिक सरल है,बनिस्बत इसके कि हम औरों को-सारी दुनिया को बदलने का प्रयास करें। जितना हम अपने अन्तःकरण का परिमार्जन और सुधार कर लेंगेयह संसार हमें उतना ही सुधरा हुआ परिलक्षित होने लगेगा।
🔴 हम दर्पण में अपना मुख देखते हैं एवं चेहरे की मलिनता को प्रयत्नपूर्वक साफ कर उसे सुन्दर बना डालते हैं। मुख उज्ज्वल-साफ और अधिक सुन्दर निकल आता है। मन की प्रसन्नता बढ़ जाती है। अन्तःकरण भी एक मुख है। उसे चेतना के दर्पण में देखने और उसे भली-भाँति परखने से उसकी मलिनताएँ भी दिखाई देने लगती हैंसाथ ही सौन्दर्य भी। कमियों को दूर करनामलिनता को मिटाना और आत्म निरीक्षण द्वारा पर्त दर पर्त्त गन्दगी को हटाकर आत्मा के अनन्त सौन्दर्य को प्रकट करना ही सच्ची उपासना है। जब सारी मलिनताएँ निकल जाती हैं तो आत्मा का उज्ज्वलसाफ और सुन्दर स्वरूप परिलक्षित होने लगता है। फिर बहिरंग में सभी कुछ अच्छा-सत्चित् आनन्दमय नजर आने लगता है।
🔵 हमें अपने आपसे प्रश्न करना चाहिए-क्या हमारे विचार गन्दे हैंकामुकता के चिन्तन में हमारा मन रस लेता हैक्या हमें इन्द्रियजन्य वासनाओं से मोह हैक्या हम उस परमसत्ता के हमारे बीच होते हुए भी भयभीत हैंयदि इस प्रश्न का उत्तर हाँ है तो हमें अपने सुधार में जुट जाना चाहिए।वस्तुतः अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिस दिन हमें अपने ऊपर के प्रश्नों का उत्तर नहीं में मिलने लगेगाउस दिन से हम संसार के सबसे सुखी व्यक्ति बन जाएँगे।
🌹 डॉ प्रणव पंड्या 🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 11

  

Saturday, February 11, 2017

*Happy Thoughts* 🌧 *क्षमा का जादू* 🌧

*Happy Thoughts*

🌧 *क्षमा का जादू* 🌧

*क्षमा माँगने की क्षमता को जानकर हर दुःख से मुक्ति पाएँ* (Say Sorry Within and Be Free) *By सरश्री*

*{क्षमा साधना के आवश्यक गुण - विश्वास की ताक़त} - 2(10)*

🔺 यदि आप क्षमा साधने के द्वारा लकीरों से मुक्त होना चाहते हैं, तो आपकी साधना में कुछ गुणों का समावेश होना ज़रूरी है। समझिए, ये गुण क्षमा साधना की इमारत के मज़बूत खंभे हैं। इन गुणों के अभाव में क्षमा साधना पूर्ण सफल नहीं हो पाती है। ये गुण इस प्रकार हैं -

*भाव*

भाव ईश्वर की भाषा है। प्रार्थना में ईश्वर आपके भावों को ग्रहण करता है, शब्दों को नहीं इसलिए क्षमा प्रार्थना पूरे भाव से करें, सिर्फ़ ऊपरी शब्दों से नहीं। यदि आप किसी को कह रहे हैं, 'मैंने तुम्हें क्षमा किया' तो यह भाव के स्तर पर क्षमा करना हो। ऐसा नहीं कि बाहर से कह दिया और अंदर अभी भी बड़बड़ चल ही रही है। *बिना भाव के प्रार्थना करना, प्रार्थना का असर कम करता है।*

कभी-कभी हमारे अंदर प्रार्थना करते हुए भी अवरोध उठते हैं। कई बार हम प्रार्थना के शब्दों को लेकर सहज नहीं होते। जब प्रार्थना में ही प्रतिरोध होता है तो वह हृदय से नहीं बल्कि मजबूरी में बोली जाती है। अतः प्रार्थना में वे ही शब्द बोलें जिनके साथ आप सहज हैं, जिनसे आपके भाव प्रकट होते हैं। प्रार्थना से पहले यह प्रार्थना करें-

'हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना भावपूर्ण हो और उसके उत्तम परिणाम दो।'

आइए, भाव के महत्त्व को एक कहानी से समझते हैं।

एक गाँव में नदी किनारे एक सुंदर चर्च था। चर्च में एक फ़ादर रहते थे। एक दिन उन्होंने सुना कि नदी के उस पार तीन साधु रहते हैं। वे लोगों को प्रार्थना सिखाते हैं। गाँव के और आस-पास के बहुत से लोग उनके पास जाकर प्रार्थना सीख रहे हैं। तीनों साधुओं की लोकप्रियता आए दिन बढ़ती जा रही है। ये बातें सुनकर फ़ादर को बड़ा दुःख हुआ। उन्हें लगा कि गाँव में मेरे होते हुए लोग इतनी दूर नदी पार करके उन साधुओं के पास कौन सी प्रार्थना सीखने जाते हैं। फ़ादर की उत्सुकता बढ़ने लगी।

एक दिन फ़ादर ने खुद साधुओं से मिलने की ठान ली और वे नाव में बैठकर नदी पार कर उनके पास गए। उन्होंने साधुओं से पूछा, 'आप लोगों को कौन सी प्रार्थना सिखाते हैं?' तब साधुओं ने उन्हें अपनी प्रार्थना बताई, 'तुम तीन हो, हम तीन हैं, हमे क्षमा करो।' साधुओं की प्रार्थना सुनकर फ़ादर हँस पड़े। कहने लगे, 'यह भी कोई प्रार्थना है? प्रार्थना ऐसी नहीं होती।' तब साधुओं ने कहा, 'हमें तो नहीं मालूम प्रार्थना कैसी होती है, अब आप ही हमें सही प्रार्थना सिखाइए।'

फ़ादर साधुओं को प्रार्थना सिखाने लगे। बड़ी लंबी प्रार्थना, उसमें कई सारे शब्द, कई सारे वाक्य, अलंकारों से सुसज्जित भाषा... फ़ादर सिखा रहे थे, साधु उसे याद करने की कोशिश कर रहे थे। भूल जाते थे, फिर याद करते थे, फिर भूल जाते थे। बड़ी मेहनत के बाद फ़ादर ने उन्हें वह लंबी प्रार्थना याद करवाई और वे नाव में बैठकर गाँव की ओर चल पड़े।

फ़ादर की नाव जब नदी के मध्य में पहुँची तब उन्होंने सुना कि उन्हें कोई पुकार रहा है। उन्होंने आवाज़ की तरफ़ देखा तो वे तीन साधु फ़ादर को आवाज दे रहे थे क्योंकि फ़ादर की सिखाई प्रार्थना वे फिर से भूल गए थे। इसलिए वे दौड़े-दौड़े फ़ादर के पास आ रहे थे... बिना नाव के... पानी की और चलते हुए...! जैसे ही वे फ़ादर की नाव तक पहुँचे, उन्होंने फ़ादर को फिर से प्रार्थना सिखाने की विनती की। लेकिन फ़ादर उन्हें पानी पर चलता देखकर स्तब्ध रह गए, उन्होंने साधुओं की साधना की शक्ति को जान लिया था।

फ़ादर ने उन्हें कहा, 'हे साधुओं, तुम्हें मेरी लंबी प्रार्थना सीखने की ज़रूरत नहीं। तुम्हारी छोटी प्रार्थना में बड़ी शक्ति है, वही सही है। *तुम तीन, हम तीन, क्षमा करो।*

असल में इस प्रार्थना से तुम तीन, हम तीन ये शब्द निकाल दिए तो भी चलेगा। असली प्रार्थना तो केवल इतनी ही है कि 'क्षमा करो' क्योंकि प्रेम, आनंद, मुक्ति देनेवाली क्षमा साधने ही सही प्रार्थना है।

इस कहानी में प्रार्थना में भाव का महत्त्व पता चलता है। तीनों साधु के शब्द पर्याप्त थे या नहीं थे किंतु उनके भाव पूर्ण थे इसलिए उनकी प्रार्थना में शक्ति थी, वह फलित होती थी। यह बात फ़ादर की भी समझ में आ गई।

बहुत से लोग सदियों से चली आ रही संस्कृत या अन्य ऐसी भाषा की प्रार्थनाएँ, मंत्र या श्लोक रोज़ाना दोहराते हैं, जिनका उन्हें अर्थ भी पता नहीं होता। अब ज़रा सोचकर देखिए, जिन शब्दों का अर्थ भी नहीं मालूम, उन्हें दोहराने से भाव कहाँ से पैदा होगा। फिर लोग भगवान से शिकायत करते हैं कि 'इतनी प्रार्थनाएँ की और फल नहीं आया।' वास्तव में सत्य तो यह है कि भगवान भाव समझता है। जब आपके भाव उस तक पहुँचे ही नहीं तो भला वह प्रार्थना पूरी कैसे करेगा।

🙏🏼 *धन्यवाद... 

महाराणा हम्मीरदेव ने अपने पौरुष के द्वारा खिलजी से चित्तौड़ को पुनः जीत लिया, इस मौके की एक ओजस्वी रचना- ‘भजन इतिहास महारानी पद्मिनी’ से ठेठ हरयाणवी तर्ज में

महाराणा हम्मीरदेव ने अपने पौरुष के द्वारा खिलजी से चित्तौड़ को पुनः जीत लिया, इस मौके की एक ओजस्वी रचना- ‘भजन इतिहास महारानी पद्मिनी’ से ठेठ हरयाणवी तर्ज में

रचना: स्व0 पं0 चन्द्रभानु आर्योपदेशक संस्थापक शांतिधर्मी

खिलजी का रंग, कर दिया भंग, जंग जीत कै गया हमीर।।टेक।।
करकै तलाश गया बनोवास वह राणा जी के पास।
करकै नाश शत्रु का खास ये मिटा दिया संत्रास।
अजयसिंह का ख्याल पहुंचा तत्काल आ मेरे लाल रणधीर।।1।।
शत्रु को मोड़ ले ली चित्तौड़ जब सुन पाया ये बात।
तैने मेरे चन्द दिए काट फंद बस आनन्द होग्या गात।
ये तेरी खलक किया राजतिलक बस अपनी अंगुली चीर।।2।।
बेटा तू है ढेठा, जेठा फेटा मुझसे आन।
गौ भक्षक को कर तक्षक तेरा रक्षक है भगवान।
तनै मेरी लाज ली बचा आज तुम करो राज मेरे वीर।।3।।
धरकै ध्यान सुनलो जवान ये होते हैं बलवान।
आन बान और शान की खातिर हो जाते कुर्बान।।
कहै चन्द्रभान जरा करकै कान पहचान मेरी तकरीर।।4।।

देशी गाय और विदेशी जर्सी गाय -------

देशी गाय और विदेशी जर्सी गाय -------
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         मित्रो सच यह है की ये जर्सी गाय -- गाय नहीं ये पूतना है !!
सबसे पहले आप ये जान लीजिये की स्वदेशी गाय और विदेशी जर्सी गाय (सूअर ) की पहचान क्या है ? देशी और विदेशी गाय को पहचानने की जो बड़ी निशानी है वो ये की देशी गाय की पीठ पर मोटा सा हम्प होता है जबकि जर्सी गाय की पीठ समतल होती है ! आपको जानकर हैरानी होगी दुनिया मे भारत को छोड़ जर्सी गाय का दूध को नहीं पीता ! जर्सी गाय सबसे ज्यादा डैनमार्क ,न्यूजीलैंड , आदि देशो मे पायी जाती है ! डैनमार्क मे तो कुल लोगो की आबादी से ज्यादा गाय है ! और आपको ये जानकार हैरानी होगी की डैनमार्क वाले दूध ही नहीं पीते ! क्यों नहीं पीते ? क्योंकि कैंसर होने की संभवना है ,घुटनो कर दर्द होना तो आम बात है ! मधुमेह (शुगर होने का बहुत बड़ा कारण है ये जर्सी गाय का दूध ! डैनमार्क वाले चाय भी बिना दूध की पीते है ! डैनमार्क की सरकार तो दूध ज्यादा होने पर समुद्र मे फेंकवा देती है वहाँ एक बात  बहुत प्रचलित है ----milk is a white poison !

और जैसा की आप जानते है भारत मे 36000 कत्लखानों मे हर साल 2 करोड़ 50 लाख गाय काटी जाती है और जो 72 लाख मीट्रिक टन मांस का उत्पादन होता है वो सबसे ज्यादा अमेरिका और उसके बाद यूरोप और फिर अरब देशों मे भेजा जाता है ! आपके मन मे सवाल आएगा कि ये अमेरिका वाले अपने देश की गाय का मांस क्यो नहीं खाते ?

दरअसल बात ये है की यूरोप और अमेरिका की जो गाय है उसको बहुत गंभीर बीमारियाँ है और उनमे एक बीमारी का नाम है Mad cow disease ! इस बीमारी से गाय के सींघ और पैरों मे पस पर जाती और घाव हो जाते हैं सामान्य रूप से जर्सी गायों को ये गंभीर बीमारी रहती है अब इस बीमारी वाली गाय का कोई मांस अगर खाये तो उसको इससे भी ज्यादा गंभीर बीमारियाँ हो सकती है ! इस लिए यूरोप और अमेरिका के लोग आजकल अपने देश की गाय मांस कम खाते हैं भारत की गाय के मांस की उन्होने ज्यादा डिमांड है ! क्योंकि भारत की गायों को ये बीमारी नहीं होती है ! आपको जानकार हैरानी होगी जर्सी गायों को ये बीमारी इस लिए होती है क्योंकि उसको भी मांसाहारी भोजन करवाया जाता है ताकि उनके शरीर मे मांस और ज्यादा बढ़े ! यूरोप और अमेरिका के लोग गाय को मांस के लिए पालते है मांस उनके लिए प्राथमिक है दूध पीने की वहाँ कोई परंपरा नहीं है वो दूध पीना अधिक पसंद भी नहीं करते !!

तो जर्सी गाय को उन्होने पिछले 50 साल मे इतना मोटा बना दिया है की वे भैंस से भी ज्यादा बत्तर हो गई है ! यूरोप की गाय की जो मूल प्रजातियाँ है holstein friesian ,jarsi ये बिलकुल विचित्र किसम की है उनमे गाय का कोई भी गुण नहीं बचा है ! जितने दुर्गुण भैंस मे होते हैं वे सब जर्सी गाय मे दिखाई देते हैं !
उदाहरण के लिए जर्सी गाय को अपने बचे से कोई लगाव नहीं होता और जर्सी गाय अपने बच्चे को कभी पहचानती भी नहीं ! कई बार ऐसा होता है की जर्सी गाय का बच्चा किसी दूसरी जर्सी गाय के साथ चला जाए उसको कोई तकलीफ नहीं !

लेकिन जो भारत की देशी गाय है वो अपने बच्चे से इतना प्रेम करती है इतना लगाव रखती है की अगर उसके बच्चे को किसी ने बुरी नजर से भी देखा तो वो मार डालने के लिए तैयार हो जाती है ! देशी गाय की जो सबसे बड़ी विशेषता है वो ये की वह लाखो की भीड़ मे अपने बच्चे को पहचान लेती है और लाखो की भीड़ मे वो बच्चा अपनी माँ को पहचान लेता हैं ! जर्सी गाय कभी भी पैदल नहीं चल पाती ! चलाने की कोशिश करो तो बैठ जाती है ! जबकि भारतीय गाय की ये विशेषता है उसे कितने भी ऊंचे पहाड़ पर चढ़ा दो चढ़ती चली जाएगी !

कभी आप हिमालय पर्वत की परिक्रमा करे जितनी ऊंचाई तक मनुष्य जा सकता है उतनी ऊंचाई तक आपको देशी गाय देखने को मिलेगी ! आप ऋषिकेश ,बद्रीनाथ ,आदि जाए जितनी ऊंचाई पर जाए 8000 -9000 फिट तक आपको देशी गाय देखने को मिलेगी ! जर्सी गाय को 10 फिट ऊपर भी  चढ़ना पड़े तो तकलीफ आ जाती है
जर्सी गाय का पूरा का पूरा स्वभाव भैंस जैसा है बहुत बार ऐसा होता है जर्सी गाय सड़क पर बैठ जाये और पीछे से लोग होरन बजा बजा कर पागल हो जाते है लेकिन वो नहीं हटती ! क्योंकि हटने के लिए जो i q चाहिए वो उसमे नहीं है !!

सामान्य रूप से ये जो जर्सी गाय उसके बारे मे यूरोप के लोग ऐसा मानते है की इसको विकसित किया गया है डुकर (सूअर )के जीन से ! भगवान ने गाय सिर्फ भारत को दी है और आपको सुन कर हैरानी होगी ये जितनी भी जर्सी गाय है यूरोप और अमेरिका मे इनका जो वंश बढ़ाया गया है वो सब artificial insemination से बढ़ाया गया और आप सब जानते है artificial insemination मे ये गुंजाइश है की किसी भी जानवर का जीन चाहे घोड़े ,का चाहें सूअर का उसमे डाल सकते है ! तो इसे सूअर से विकसित किया गया है ! और artificial  insemination से भी उसको गर्भवती बनाया जाता है ये उनके वहाँ पिछले 50 साल से चल रहा है !!
यूरोप और अमेरिका के भोजन विशेषज्ञ (nutrition expert ) हैं ! उनका कहना है की अगर जर्सी गाय का भोजन करे तो 15 से 20 साल मे कैंसर होने की संभवना ,घुटनो का दर्द तो तुरंत होता है। sugar,  arthritis, ashtma और ऐसे 48 रोग होते है इसलिए उनके देश मे आजकल एक अभियान चल रहा है की अपनी गाय का मांस कम खाओ और भारत की सुरक्षित गाय मांस अधिक खाओ ! इसी लिए यूरोपियन कमीशन ने भारत सरकार के साथ समझोता कर रखा है और हर साल भारत से 72 लाख मीट्रिक टन मांस का निर्यात होता है जिसके लिए 36000 कत्लखाने इस देश मे चल रहें हैं !!

तो मित्रो उनके देश के लोग ना तो आजकल अपनी गाय का मांस खा रहे हैं और ना ही दूध पी रहें हैं ! और हमारे देश के नेता इतने हरामखोर है की एक तरह तो अपनी गाय का कत्ल करवा रहें हैं और दूसरी तरफ उनकी सूअर जर्सी गाय को भारत मे लाकर हमे बर्बाद करने मे लगे है ! पंजाब और गुजरात से सबसे ज्यादा जर्सी गाय है ! और एक गंभीर बात आपको सुन कर हैरानी होगी भारत की बहुत सी घी बेचने वाली कंपनियाँ बाहर से जर्सी गाय का दूध import करती है !

दूध को दो श्रेणियों मे बांटा गया है A1 और A2 !
A1 जर्सी का A2 भारतीय देशी गाय का !

तो होता ये है की इन कंपनियो को अधिक से अधिक रोज घी बनाना है अब इतनी गाय को संभालना उनका पालण पोषण करना वो सब तो इनसे होता नहीं ! और ना ही इतनी गाय ये डेयरी मे रख सकते है। तो ये लोग क्या करते है डैनमार्क आदि देशो से A1 दूध (जर्सी गाय ) का मँगवाते है powder (सूखा दूध )के रूप मे ! उनसे घी बनाकर हम सबको बेच रहें है ! और हम सबकी मजबूरी ये है की आप इनके खिलाफ कुछ कर नहीं सकते क्योंकि भारत मे कोई ऐसा कानून नहीं बना जो ये कहता है की जर्सी गाय का दूध A1 नहीं पीना चाहिए ! अगर कानून होगा तो ही आप कुछ करोगे ना ? यहाँ A1 – को जाँचने की लैब तक नहीं ! नेता लोग देश बेचने में लगे हैं। गाय की पहचान हमने ऊपर बताई थी की उसकी पीठ पर मोटा सा हम्प होता है ! दरअसल ये हम्प ही सूर्य से कुछ अलग प्रकार की तिरंगे लेता है वही उसके दूध ,मूत्र और गोबर को पवित्र बनाती है जिससे उसमे इतने गुण है ! गौ माता सबसे पहले समुन्द्र मंथन से निकली थी जिसे कामधेनु कहते है गौ माता को वरदान है की इसके शरीर से निकली कोइ भी वस्तु बेकार नहीं जाएगी ! दूध ,हम पी लेते है ,मूत्र से ओषधि बनती है ,गोबर से खेती होती है ! और गोबर गैस गाड़ी चलती है , बिजली बनती है ! सूर्य से जो किरणे इसके शरीर मे आती है उसी कारण इसे दूध मे स्वर्ण गुण आता है और इसके दूध का रंग स्वर्ण (सोने जैसा होता है ) ! और गाय के दूध से 1 ग्राम भी कोलोस्ट्रोल नहीं बढ़ता !

कल से ही देशी गाय का दूध पिये अपने दूध वाले भाई से पूछे वो किस गाय का दूध लाकर आपको दे रहा है (वैसे बहुत से दूध वालों को देशी -जर्सी गाय का अंतर नहीं पता होगा ) आप बता दीजिये दूध देशी गाय का ही पिये ! और घी भी देशी गाय का ही खाएं !! गाय के घी के बारे मे अधिक जानकारी के लिए ये जान लीजिये !

आयुर्वेद मे खाने वाला गाय के दूध का घी निकालने की जो विधि लिखी है उस विधि से आप घी निकले तो आपको 1200 से 2000 रुपए किलो पड़ेगा ! क्योकि 1 किलो घी के लिए 25 से 30 लीटर दूध लग जाता है ! महंगा होने का कारण ये भी है की देशी गाय की संख्या काम होती जा रही है कत्ल बहुत हो रहा है वैसे तो यही घी सबसे बढ़िया है ! लेकिन एक दूसरे ढंग से भी आजकल निकालने लग गए हैं ! जिससे दूध से सीधा क्रीम निकालकर घी बनाया जाता है ! अब समस्या ये है की लगभग सभी कंपनियाँ या तो भैंस का घी बेचती है या गाय का घी बोलकर जर्सी का बेच रही है !

आपको अगर घी खाना ही है तो भारत की सबसे बड़ी गौशाला – विश्व की सबसे बड़ी गौशाला ---
वो है राजस्थान मे उसका नाम है
पथमेढ़ा गौ शाला --------
******************
वहां का घी खाइये। पथमेढ़ा गौशाला मे 3 लाख देशी गाय है ! इनके घी की सबसे बड़ी विशेषता है ये है की ये देशी गाय का घी ही बेचते हैं ! बस अंतर ये है की यह क्रीम वाले ढंग से निकाला बनाया जाता है लेकिन फिर भी भैंस और जर्सी सूअर के घी की तुलना मे बहुत बहुत बढ़िया है ! लेकिन इसका मूल्य साधारण घी से थोड़ा ज्यादा है ये 1 लीटर 600 रूपये मे उपलब्ध है ! भगवान की अगर आप पर आर्थिक रूप से ज्यादा कृपा तो आप देशी गाय का ही घी खाएं !! कम खा लीजिये लेकिन जर्सी का कभी मत खाएं !! और दूध भी हमेशा देशी गाय का ही पिये !

और अंत मे एक और बात जान लीजिये अब इन विदेशी लोगो को भारत की गाय की महत्ता का अहसास होने लगा है आपको जानकर हैरानी होगी भारतीय नस्ल की सबसे बढ़िया गाय( गीर गाय ) को जर्मनी वाले अपने देश मे ले जाकर इनका वंश आगे बढ़ाकर 2 लाख डालर (लगभग 1 करोड़ की) एक गाय बेच रहें है !
जबकि भारत मे ये गीर गाय सिर्फ 5000 ही रह गई है
The real history...

Friday, February 10, 2017

चौहान_राजपूत


#चौहान_राजपूत
मनीषा सिंह की कलम से संसार एक सागर है, जिसमें अनंत लहरें उठती रहती हैं। ये लहरें कितने ही लोगों के लिए काल बन जाती हैं, तो कुछ ऐसे शूरवीर भी होते हैं जो इन लहरों से ही खेलते हैं और खेलते-खेलते लहरों को अपनी स्वर लहरियों पर नचाने भी लगते हैं। ऐसा संयोग इतिहास के दुर्लभतम क्षणों में ही देखने को मिलता है। कुछ लोग मिट्टी में से उठते हैं, और मिट्टी में ही मिल जाते हैं, पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मिट्टी को सोना बना  देते हैं और उसे इतिहास में गौरव का स्थान दिलाने में सफल हो जाते हैं। कुछ लोग काल के सांचे में ढल जाते हैं, तो कुछ काल के सांचों को ही बदल जाते हैं।
पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज सन ११०५ – ११३० ईस्वी तक शासन किया जिन्हें अजयदेव एवं सल्हाना के नाम से भी जाने जाते हैं राजा अजयदेव चौहान ने ही (1100) ११०० ई. में अजमेर नगर की स्थापना की थी। अजयदेव को 'अजयराज चौहान' कहकर भी कई स्थानों पर सम्बोधित किया गया है । यह सम्भव है कि पुष्कर अथवा अनासागर झील के निकट होने के कारण ही अजयदेव ने अपनी राजधानी का नाम 'अजयमेरु' ('मेर' –झील ) रखा हो । अजयदेव चौहान ने तारागढ़ की पहाड़ी पर एक क़िला 'गढ़-बिटली' नाम से बनवाया था, जिसे कर्नल टॉड ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ में "राजपूताने की कुँजी" कहा है । अजमेर की स्थापना चौहान वंश के राजा अजयराज चौहान ने गढ़ अजयमेरू के नाम से शुक्ल प्रतिपदा के प्रथम दिन की थी । विख्यात चौहान नरेश अजयराज चौहान के नाम पर चारण-भाट इसे 'अजयमेरु' और क़िले को 'अजयमेरु दुर्ग' कहने लगे थे।
पृथ्वीराजविजया एवं बिजोलिया शिलालेख में गजनी की मुस्लिम आक्रमणकारियों पर विजय पाने पर महाराजा अजयराज को विशेष प्रसिद्ध माना गया हैं इन दो भारतीय ग्रंथो के अलावा विदेशी ग्रन्थ तबक़ात-ए-नासिरी एवं तारीख-ए-फिरीश्ता ने भी चौहान राजा अजयराज एवं गजनी के मुस्लिम सेना के मध्य युद्ध का वर्णन मिलता हैं – “ ग़जनी का शासक बहराम शाह ने भारतवर्ष पर आक्रमण करने के लिए सेनापति नियुक्त किया ।“ ग़जनी ने अपने सेना के साथ नागौर पर आक्रमण किया था प्रभावाकाचरिता के अनुसार उस समय नागौर राज्य राजा अजयराज के साम्राज्य का हिस्सा था ।
भारतीय एवं विदेशी इतिहासकारों ने इस बात की पुष्टिकरण किया की अजयराज शाकंभरी (साँभर) के चौहानवंश नरेश ने तुर्क , बगदादी , ख़्वारेज़्म साम्राज्य के आक्रमणकारियों को भारतवर्ष से खदेड़ा था एवं गज़नी शासक बहराम शाह के खिलाफ सफल युद्ध अभियान के द्वारा भारतवर्ष को गजनी शासक के हाथो से मुक्त करवाया था ।
दोबार तुर्क हमलावरों को खदेड़ा था अजयराज चौहान ने जिसके पश्चात तुर्क हमलवारो ने अलग अलग साम्राज्य के सुल्तानों को साथ लेकर संयुक्त युद्ध अभियान किया  ।
अजयराज चौहान इतिहास के प्रथम एवं अंतिम शासक थे जिनके खिलाफ तीन देशो के अलग अलग साम्राज्य के सुल्तानों ने संयुक्त युद्ध अभियान किया जिसमे तुर्क हमलावर सेल्जुक साम्राज्य के सुल्तान गीयाथ- अल- दीन महमूद प्रथम, अब्बासिद साम्राज्य बगदाद के खलीफ़ा अल-अर्शिद , ख़्वारेज़्म साम्राज्य के सुल्तान क़ुतुब-अद-दीन-मुहम्मद प्रथम था । सन १११० में लवपुरा (वर्त्तमान लाहौर) में हुआ था संयुक्त युद्ध अभियान में एक से दो लाख मलेच्छ हमलावरों की सेना थी दूसरी तरफ अजयराज चौहान ने एकछत्र शासन स्थापित करने हेतु जिन जिन राज्य पर विजय पाया था उन पड़ोसी राज्यों के राजा भी अजयराज चौहान की सहायता के लिए रणभूमि में अपनी सेना भेजी (कुछ मुर्ख इतिहासकार कट्टर हिन्दू का चोला पहने हमेसा यह जताते हैं हिन्दू कभी एक नही हुआ एक नही हुआ होता तो भारतवर्ष अखंड नही रहता) सम्राट अजयराज चौहान महापराक्रमी योद्धा थे इन्होने इस युद्ध में मलेच्छ हमलावरों को भारतवर्ष से खदेड़ा था । जहा गदारो ने अपने राजाओ की इतिहास लिखने में गद्दारी किया वही विदेशी लेखको ने न्याय किया Henry Cousens ने अपनी किताब Military History of Invaders में पृष्ठ 48-55 में इस युद्ध को ख़ास स्थान दिया गया हैं इस युद्ध का वर्णन करते हुए अजयराज चौहान को “Safeguard Wall of India” अजयराज चौहान भारतमाता के लिए रक्षा की दिवार थे एवं उनकी तलवार और उनकी बाहुबल कवच थे । दो बार तुर्क हमलावर अजयराज चौहान से परास्त होने के कारण तीसरी बार अकेले युद्ध करने का साहस नही किया जिस करण तीन साम्राज्य के सुल्तानों के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण किया एवं दो लाख की सेना अजयराज चौहान की पराक्रम एवं रणनीति के आगे धराशायी होगये थे । सम्राट अजयराज के तलवारों को कई इतिहासकारों ने जैसे (Jordens Benito ने अपने किताब Ends of Invasions “12th centuries Asia’s ruler of Chahmana Dynasty’s swords took the title of Invaders Slaughter Machine”) अर्थात मलेच्छ वध का यन्त्र कहा हैं (ऐसे इतिहास को मुग़लिया हरम में पले इतिहासकारों ने नही लिखा कैसे लिखते अगर लिखते तो उनके बैंक खाते में अंग्रेजी डॉलर आने बंद होजाते)
Battle of Nagaur (नागौर युद्ध) सन १११८ -:
बहराम शाह ने अपने सेनापति शाहब-उद-दीन को भाड़ी संख्या की सेना के साथ (ग़जनी सेना की संख्या लाखों में हुआ करती थी भिन्न मत हैं इतिहासकारों की कोई कहा तीन लाख तो कोई पांच लाख तो कोई एक लाख अलग अलग इतिहासकारों से अलग अलग संख्याओं की व्याख्यान मिला दुविधा के करण सेना की संख्या यहाँ नही लिख पायी परन्तु यह तय था सेना लाखो की संख्या में थी ) नागौर राज्य पर आक्रमण किया था । नागौर अजयराज के साम्राज्य का हिस्सा था अजयराज अपनी सेना के साथ घेराबंदी बनाये नागौर सीमा पर खड़े थे  गजनी शासक के सेनापति शाहब-उद-दीन ने चौहान सम्राट अजयराज को चेतावनी दिया की वो बहराम शाह की आधीनता स्वीकार कर राजकोष कि धन संपत्ति गजनी शासक को मुवाज़े के तौर पर देने के लिए कहा , परन्तु अजयराज ने शांतिवार्ता ठुकराते हुए युद्धभूमि में लड़ने का आह्वान किया कहा “नागौर को जितना हैं एवं नागौर की धन संपत्ति पर अधिकार करना हैं तो रण में हमे परास्त करना होगा” उसने बड़ी बुद्घिमत्ता से कार्य किया और अपनी सेना की घोड़े की नाल के आकार की व्यूह रचना की जिससे शत्रु सेना का सफाया करने में तथा उसके अहंकार को तोडऩे में उसे सफलता ही मिली । अपने सेना में चेतना भड़ते हुए हुँकार भड़ा एवं लाखों की तादात में आये गजनी की सेना पर टूट परा विजय या वीरगति का लक्ष्य साधे अजयराज काल रूप धारण कर मलेच्छों का संघार करने लगे । तबक़ात-ए-नासिरी vol. III के अनुसार गजनी को भाड़ी नुक्सान उठाना पड़ा इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध हुआ जहाँ गजनी सेना का एक भी सैनिक जीवित नही बचा सेनापति शाहब-उद-दीन भी अजयराज के हाथो मारा गया । अजयराज एक अत्यंत कुशल और दुर्दशिय राजा था जिन्होंने अपने शत्रु को कभी जीवित नही जाने दिया संभवत यही मुख्या करण था बहराम शाह कभी स्वयं अजयराज से युद्ध नही किया उसने अपने सेनापतियो भेजकर युद्ध किया । संदर्भ-: तबक़ात-ए-नासिरी vol. III मिन्हाज-ए-सिराज , प्रभावकाचरिता ,  Early Chauhān Dynasties Dasharatha Sharma (1959)
(The Prithviraja-Vijaya states that Ajayaraja defeated the Garjana Matangas thrice("Ghazna Muslims").The Prabandha Kosha also claims that Ajayaraja defeated "Sahavadina" (Sanskritized form of Shahab-ud-Din). This probably refers to his repulsion of invasions by Ghaznavid generals. The 13th century Muslim historian Minhaj-i-Siraj states that the Ghaznavid ruler Bahram Shah made several expeditions to India during this time.)
पृथ्वीराजविजया के अनुसार अजयराज चौहान ने तीन बार ग़जनी के मुस्लिम सेना को परास्त किया अजयराज चौहान ने ग़जनी के शासक बहराम शाह द्वारा भेजे गये सैन्यबल की सैन्य संचालन मुहम्मद बहलिम नामक सेनापति कर रहा था ग़जनी । सत्यपूर (वर्त्तमान सांचोर ( जालोर )) नामक स्थान पर सन १११९ युद्ध हुआ था अजयराज चौहान एक महावीर योद्धा था जिन्होंने तुर्कों को कई बार खदेड़ा था इनसे मलेच्छ सेना कांपती थी ग़जनी परास्त होने के बाद अगली बार जब आक्रमण करता था तीन गुणा अधिक सैन्यबल के साथ आक्रमण किया सम्राट अजयराज ने फसल नष्ट करवा दिया यह एक रणनीति होती हैं जिससे शत्रु सेना कुछ भी अनाज का सेवन ना कर पायें युद्ध कई दिनों तक चलता था और राशन पर्याप्त नही होता था क्योंकि मुस्लिम सेना लूटमार कर भागने के इरादे से आते थे जिस वजह से राशन अपने साथ नही लाते थे परन्तु युद्ध में भी अगर जाते थे तो जिस राज्य पर आक्रमण करते थे वह के फसल को पका कर खाते थे । यह युद्ध 9 दिवसीय युद्ध था अजयराज चौहान ने अति उतम रणनीति का प्रयोग किया अस पास के फसल को नष्ट करवा दिया घोड़ो के लिए घांस तक खाने को नही छोड़ा । मुहम्मद बहलिम की सेना संख्या में भले ही विशाल सेना थी परन्तु अजयराज के पास बुद्धिमत्तापूर्ण रणनीति था साथ ही चौहान वंश भूजाबल के लिए तो विख्यात थे ही । भीषण युद्ध हुआ इस युद्ध में अजयराज चौहान की रणनीति काम कर गयी एवं लम्बी युद्ध चली नौ दिवसीय जिससे मुहम्मद बहलिम ने आत्मसमर्पण कर भाग खड़ा हुआ । साम , दाम , दंड , वेद का प्रयोग किया अजयराज चौहान की हर योजना सफल सिद्ध हो रही थी और शत्रु अपने ही बुने जाल में फंसकर रह गया था। सत्यपुर की ओर बढ़ते मुहम्मद बहलिम को सत्यपुर ग़जनी से चाहे भले ही दूर ना लगा हो पर अब सत्यपुर से ग़जनी तो इतनी दूर लग रहा था कि संभवत: वह पूरे जन्म भागकर भी उसकी दूरी को नाप न सकेगा। कहा जाता हैं मुहम्मद बहलिम के इस हार के बाद उन्हें बंदी बना लिया जाता हैं बहराम शाह द्वारा । सम्राट अजयराज चौहान की प्रशंसा में यहां जितना लिखा जाए उतना कम है। क्योंकि उसकी देशभक्ति ने समकालीन इतिहास के पृष्ठों पर जिस प्रकार रोमांच और उत्साह का गुलाल छिड़का है उससे हमारे वीरों के ‘वसंत मनाने’ की वास्तविक परिपाटी और वास्तविक उद्देश्य का ज्ञान होता है।
सन ११२१ में Battle of KasyapaPura (वर्त्तमान मुल्तान)
तृतीय युद्ध ग़जनी शासक बहराम शाह ने सालर हुसैन को नागौर विजय के लिए भेजा था अजयराज चौहान के गुप्तचरों ने उन्हें पहले से सावधान कर दिया था अजयराज चौहान ने बुद्धि एवं पराक्रम का अद्भुत उदाहरण पेश किया कश्यप-पुरा (मुल्तान) एवं सिन्धु नदी के सीमारेखा पर चौहान सेना दीवार बन के खड़ा था सालर हुसैन को इस बात की उपेक्षा नही थी की राजपूत सेना कश्यप-पुरा (मुल्तान) एवं सिन्धु नदी की सीमारेखा पर रक्षा कवच बने खड़े होंगे ग़जनी की सेना को संभालने का मौका तक नही मिला राजपूत सेना ने तीरों की बौछारें करने लग गये जिससे ग़जनी की सेना तितर बितर होगया इससे पहले की सालर हुसैन कुछ समझ पाते सालर हुसैन की समंदर जितना विशाल सेना आधा से ज्यादा राजपूत सेना की तीरों की बौछार से ख़तम होगये थे और आधी सेना को राजपूत सम्राट अजयराज चौहान की २५,००० पैदल सैन्यबल काल बनकर निगल गये सालर हुसैन की मृत्यु अजयराज चौहान के हाथो हुआ सालर हुसैन को परास्त कर कम्बोज (वर्त्तमान काबुल) पर आक्रमण कर कम्बोज से गजनी का शासक बहराम शाह को खदेड़ा । बहराम शाह ने खुद लिखा था “अजयराज चौहान की वजह से दिल्ली का तख्त ही नही सम्पूर्ण भारतवर्ष उनके हाथ से निकल गया था” Reference-: Period of Ghaznavids C.E. Bosworth Page-: 120
कुछ इतिहासकारों के अनुसार राजपूतो ने ग़जनी पर वापस अपना आधिपत्यं स्थापित कर लिया था और इतिहासकार लेविट डुसों (Lewitt Duson) Rajputana Ruler of Centuries के अनुसार अजयराज चौहान का शासन था ग़जनी पर परन्तु इस विषय में ज्यादा तथ्य ना मिलने के करण दावे के साथ कुछ नही कह सकती ।      
महाराजा अजयराज जी ने उम्र के आखिरी पङाव मे राज-काज छोड़ प्रभु भक्ति कि तरफ मुंह किया और योगी हो गए । उस जमाने में राजपूत जब इस उम्र में घर त्याग करते तो अपना घोड़ा व तलवार साथ रखते थे और सफेद वस्त्र धारण कर एकांत वास को चले जाते थे ।।
अजयराज चौहान को केवल अजयमेरु शहर के निर्माण के लिए जाना जाता हैं परन्तु कोई भी इतिहासकार जो भारत के सच्चे इतिहास का लेखन करते हैं उनमे से किसी ने भी सत्य को नही लिखा यहाँ तक राजपूत इतिहासकार भी चुक गये दशरथ शर्मा एवं मिन्हाज-ए-नसीरी , तारीख-ए-फिरीश्ता , पृथ्वीराजविजया , प्रबंधकोश के अलावा कही और नही मिलता हैं । अजयराज चौहान के सहशक्त राजा थे इन्होने साम्राज्य विस्तार के अलवा ग़जनी शासक के नागौर आक्रमण के बाद उन्होंने दूरदर्शिता से काम लेते हुए भारतवर्ष की सीमारेखा पर मजबूत सुरक्षाकवच का निर्माण किया । अजयराज को अपराजे सम्राट कहना कदापि गलत नही होगा बारहवीं सताब्दी जब भारत पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे थे मलेच्छ हमलावरों का उसवक्त अजयराज ने इन विदेशी आक्रमणकारियों का दमन कर भारत को मुक्त करवाया था । वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ऐसे अप्रतिम योद्धा के कृतियों को नज़रंदाज़ करने का फल आज हम सब भुगत रहे हैं भारत में अकबर , तैमुर , गोरी पैदा हो रहे हैं परन्तु हिन्दुओं में कोई अजयराज चौहान , वाक्पतिराज , पृथ्वीराज चौहान , महाराणा प्रताप , लक्ष्मीबाई , रानी कुरमदेवी जन्म नही ले पा रही हैं ।

चौहान_राजपूत


#चौहान_राजपूत
मनीषा सिंह की कलम से संसार एक सागर है, जिसमें अनंत लहरें उठती रहती हैं। ये लहरें कितने ही लोगों के लिए काल बन जाती हैं, तो कुछ ऐसे शूरवीर भी होते हैं जो इन लहरों से ही खेलते हैं और खेलते-खेलते लहरों को अपनी स्वर लहरियों पर नचाने भी लगते हैं। ऐसा संयोग इतिहास के दुर्लभतम क्षणों में ही देखने को मिलता है। कुछ लोग मिट्टी में से उठते हैं, और मिट्टी में ही मिल जाते हैं, पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मिट्टी को सोना बना  देते हैं और उसे इतिहास में गौरव का स्थान दिलाने में सफल हो जाते हैं। कुछ लोग काल के सांचे में ढल जाते हैं, तो कुछ काल के सांचों को ही बदल जाते हैं।
पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज सन ११०५ – ११३० ईस्वी तक शासन किया जिन्हें अजयदेव एवं सल्हाना के नाम से भी जाने जाते हैं राजा अजयदेव चौहान ने ही (1100) ११०० ई. में अजमेर नगर की स्थापना की थी। अजयदेव को 'अजयराज चौहान' कहकर भी कई स्थानों पर सम्बोधित किया गया है । यह सम्भव है कि पुष्कर अथवा अनासागर झील के निकट होने के कारण ही अजयदेव ने अपनी राजधानी का नाम 'अजयमेरु' ('मेर' –झील ) रखा हो । अजयदेव चौहान ने तारागढ़ की पहाड़ी पर एक क़िला 'गढ़-बिटली' नाम से बनवाया था, जिसे कर्नल टॉड ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ में "राजपूताने की कुँजी" कहा है । अजमेर की स्थापना चौहान वंश के राजा अजयराज चौहान ने गढ़ अजयमेरू के नाम से शुक्ल प्रतिपदा के प्रथम दिन की थी । विख्यात चौहान नरेश अजयराज चौहान के नाम पर चारण-भाट इसे 'अजयमेरु' और क़िले को 'अजयमेरु दुर्ग' कहने लगे थे।
पृथ्वीराजविजया एवं बिजोलिया शिलालेख में गजनी की मुस्लिम आक्रमणकारियों पर विजय पाने पर महाराजा अजयराज को विशेष प्रसिद्ध माना गया हैं इन दो भारतीय ग्रंथो के अलावा विदेशी ग्रन्थ तबक़ात-ए-नासिरी एवं तारीख-ए-फिरीश्ता ने भी चौहान राजा अजयराज एवं गजनी के मुस्लिम सेना के मध्य युद्ध का वर्णन मिलता हैं – “ ग़जनी का शासक बहराम शाह ने भारतवर्ष पर आक्रमण करने के लिए सेनापति नियुक्त किया ।“ ग़जनी ने अपने सेना के साथ नागौर पर आक्रमण किया था प्रभावाकाचरिता के अनुसार उस समय नागौर राज्य राजा अजयराज के साम्राज्य का हिस्सा था ।
भारतीय एवं विदेशी इतिहासकारों ने इस बात की पुष्टिकरण किया की अजयराज शाकंभरी (साँभर) के चौहानवंश नरेश ने तुर्क , बगदादी , ख़्वारेज़्म साम्राज्य के आक्रमणकारियों को भारतवर्ष से खदेड़ा था एवं गज़नी शासक बहराम शाह के खिलाफ सफल युद्ध अभियान के द्वारा भारतवर्ष को गजनी शासक के हाथो से मुक्त करवाया था ।
दोबार तुर्क हमलावरों को खदेड़ा था अजयराज चौहान ने जिसके पश्चात तुर्क हमलवारो ने अलग अलग साम्राज्य के सुल्तानों को साथ लेकर संयुक्त युद्ध अभियान किया  ।
अजयराज चौहान इतिहास के प्रथम एवं अंतिम शासक थे जिनके खिलाफ तीन देशो के अलग अलग साम्राज्य के सुल्तानों ने संयुक्त युद्ध अभियान किया जिसमे तुर्क हमलावर सेल्जुक साम्राज्य के सुल्तान गीयाथ- अल- दीन महमूद प्रथम, अब्बासिद साम्राज्य बगदाद के खलीफ़ा अल-अर्शिद , ख़्वारेज़्म साम्राज्य के सुल्तान क़ुतुब-अद-दीन-मुहम्मद प्रथम था । सन १११० में लवपुरा (वर्त्तमान लाहौर) में हुआ था संयुक्त युद्ध अभियान में एक से दो लाख मलेच्छ हमलावरों की सेना थी दूसरी तरफ अजयराज चौहान ने एकछत्र शासन स्थापित करने हेतु जिन जिन राज्य पर विजय पाया था उन पड़ोसी राज्यों के राजा भी अजयराज चौहान की सहायता के लिए रणभूमि में अपनी सेना भेजी (कुछ मुर्ख इतिहासकार कट्टर हिन्दू का चोला पहने हमेसा यह जताते हैं हिन्दू कभी एक नही हुआ एक नही हुआ होता तो भारतवर्ष अखंड नही रहता) सम्राट अजयराज चौहान महापराक्रमी योद्धा थे इन्होने इस युद्ध में मलेच्छ हमलावरों को भारतवर्ष से खदेड़ा था । जहा गदारो ने अपने राजाओ की इतिहास लिखने में गद्दारी किया वही विदेशी लेखको ने न्याय किया Henry Cousens ने अपनी किताब Military History of Invaders में पृष्ठ 48-55 में इस युद्ध को ख़ास स्थान दिया गया हैं इस युद्ध का वर्णन करते हुए अजयराज चौहान को “Safeguard Wall of India” अजयराज चौहान भारतमाता के लिए रक्षा की दिवार थे एवं उनकी तलवार और उनकी बाहुबल कवच थे । दो बार तुर्क हमलावर अजयराज चौहान से परास्त होने के कारण तीसरी बार अकेले युद्ध करने का साहस नही किया जिस करण तीन साम्राज्य के सुल्तानों के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण किया एवं दो लाख की सेना अजयराज चौहान की पराक्रम एवं रणनीति के आगे धराशायी होगये थे । सम्राट अजयराज के तलवारों को कई इतिहासकारों ने जैसे (Jordens Benito ने अपने किताब Ends of Invasions “12th centuries Asia’s ruler of Chahmana Dynasty’s swords took the title of Invaders Slaughter Machine”) अर्थात मलेच्छ वध का यन्त्र कहा हैं (ऐसे इतिहास को मुग़लिया हरम में पले इतिहासकारों ने नही लिखा कैसे लिखते अगर लिखते तो उनके बैंक खाते में अंग्रेजी डॉलर आने बंद होजाते)
Battle of Nagaur (नागौर युद्ध) सन १११८ -:
बहराम शाह ने अपने सेनापति शाहब-उद-दीन को भाड़ी संख्या की सेना के साथ (ग़जनी सेना की संख्या लाखों में हुआ करती थी भिन्न मत हैं इतिहासकारों की कोई कहा तीन लाख तो कोई पांच लाख तो कोई एक लाख अलग अलग इतिहासकारों से अलग अलग संख्याओं की व्याख्यान मिला दुविधा के करण सेना की संख्या यहाँ नही लिख पायी परन्तु यह तय था सेना लाखो की संख्या में थी ) नागौर राज्य पर आक्रमण किया था । नागौर अजयराज के साम्राज्य का हिस्सा था अजयराज अपनी सेना के साथ घेराबंदी बनाये नागौर सीमा पर खड़े थे  गजनी शासक के सेनापति शाहब-उद-दीन ने चौहान सम्राट अजयराज को चेतावनी दिया की वो बहराम शाह की आधीनता स्वीकार कर राजकोष कि धन संपत्ति गजनी शासक को मुवाज़े के तौर पर देने के लिए कहा , परन्तु अजयराज ने शांतिवार्ता ठुकराते हुए युद्धभूमि में लड़ने का आह्वान किया कहा “नागौर को जितना हैं एवं नागौर की धन संपत्ति पर अधिकार करना हैं तो रण में हमे परास्त करना होगा” उसने बड़ी बुद्घिमत्ता से कार्य किया और अपनी सेना की घोड़े की नाल के आकार की व्यूह रचना की जिससे शत्रु सेना का सफाया करने में तथा उसके अहंकार को तोडऩे में उसे सफलता ही मिली । अपने सेना में चेतना भड़ते हुए हुँकार भड़ा एवं लाखों की तादात में आये गजनी की सेना पर टूट परा विजय या वीरगति का लक्ष्य साधे अजयराज काल रूप धारण कर मलेच्छों का संघार करने लगे । तबक़ात-ए-नासिरी vol. III के अनुसार गजनी को भाड़ी नुक्सान उठाना पड़ा इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध हुआ जहाँ गजनी सेना का एक भी सैनिक जीवित नही बचा सेनापति शाहब-उद-दीन भी अजयराज के हाथो मारा गया । अजयराज एक अत्यंत कुशल और दुर्दशिय राजा था जिन्होंने अपने शत्रु को कभी जीवित नही जाने दिया संभवत यही मुख्या करण था बहराम शाह कभी स्वयं अजयराज से युद्ध नही किया उसने अपने सेनापतियो भेजकर युद्ध किया । संदर्भ-: तबक़ात-ए-नासिरी vol. III मिन्हाज-ए-सिराज , प्रभावकाचरिता ,  Early Chauhān Dynasties Dasharatha Sharma (1959)
(The Prithviraja-Vijaya states that Ajayaraja defeated the Garjana Matangas thrice("Ghazna Muslims").The Prabandha Kosha also claims that Ajayaraja defeated "Sahavadina" (Sanskritized form of Shahab-ud-Din). This probably refers to his repulsion of invasions by Ghaznavid generals. The 13th century Muslim historian Minhaj-i-Siraj states that the Ghaznavid ruler Bahram Shah made several expeditions to India during this time.)
पृथ्वीराजविजया के अनुसार अजयराज चौहान ने तीन बार ग़जनी के मुस्लिम सेना को परास्त किया अजयराज चौहान ने ग़जनी के शासक बहराम शाह द्वारा भेजे गये सैन्यबल की सैन्य संचालन मुहम्मद बहलिम नामक सेनापति कर रहा था ग़जनी । सत्यपूर (वर्त्तमान सांचोर ( जालोर )) नामक स्थान पर सन १११९ युद्ध हुआ था अजयराज चौहान एक महावीर योद्धा था जिन्होंने तुर्कों को कई बार खदेड़ा था इनसे मलेच्छ सेना कांपती थी ग़जनी परास्त होने के बाद अगली बार जब आक्रमण करता था तीन गुणा अधिक सैन्यबल के साथ आक्रमण किया सम्राट अजयराज ने फसल नष्ट करवा दिया यह एक रणनीति होती हैं जिससे शत्रु सेना कुछ भी अनाज का सेवन ना कर पायें युद्ध कई दिनों तक चलता था और राशन पर्याप्त नही होता था क्योंकि मुस्लिम सेना लूटमार कर भागने के इरादे से आते थे जिस वजह से राशन अपने साथ नही लाते थे परन्तु युद्ध में भी अगर जाते थे तो जिस राज्य पर आक्रमण करते थे वह के फसल को पका कर खाते थे । यह युद्ध 9 दिवसीय युद्ध था अजयराज चौहान ने अति उतम रणनीति का प्रयोग किया अस पास के फसल को नष्ट करवा दिया घोड़ो के लिए घांस तक खाने को नही छोड़ा । मुहम्मद बहलिम की सेना संख्या में भले ही विशाल सेना थी परन्तु अजयराज के पास बुद्धिमत्तापूर्ण रणनीति था साथ ही चौहान वंश भूजाबल के लिए तो विख्यात थे ही । भीषण युद्ध हुआ इस युद्ध में अजयराज चौहान की रणनीति काम कर गयी एवं लम्बी युद्ध चली नौ दिवसीय जिससे मुहम्मद बहलिम ने आत्मसमर्पण कर भाग खड़ा हुआ । साम , दाम , दंड , वेद का प्रयोग किया अजयराज चौहान की हर योजना सफल सिद्ध हो रही थी और शत्रु अपने ही बुने जाल में फंसकर रह गया था। सत्यपुर की ओर बढ़ते मुहम्मद बहलिम को सत्यपुर ग़जनी से चाहे भले ही दूर ना लगा हो पर अब सत्यपुर से ग़जनी तो इतनी दूर लग रहा था कि संभवत: वह पूरे जन्म भागकर भी उसकी दूरी को नाप न सकेगा। कहा जाता हैं मुहम्मद बहलिम के इस हार के बाद उन्हें बंदी बना लिया जाता हैं बहराम शाह द्वारा । सम्राट अजयराज चौहान की प्रशंसा में यहां जितना लिखा जाए उतना कम है। क्योंकि उसकी देशभक्ति ने समकालीन इतिहास के पृष्ठों पर जिस प्रकार रोमांच और उत्साह का गुलाल छिड़का है उससे हमारे वीरों के ‘वसंत मनाने’ की वास्तविक परिपाटी और वास्तविक उद्देश्य का ज्ञान होता है।
सन ११२१ में Battle of KasyapaPura (वर्त्तमान मुल्तान)
तृतीय युद्ध ग़जनी शासक बहराम शाह ने सालर हुसैन को नागौर विजय के लिए भेजा था अजयराज चौहान के गुप्तचरों ने उन्हें पहले से सावधान कर दिया था अजयराज चौहान ने बुद्धि एवं पराक्रम का अद्भुत उदाहरण पेश किया कश्यप-पुरा (मुल्तान) एवं सिन्धु नदी के सीमारेखा पर चौहान सेना दीवार बन के खड़ा था सालर हुसैन को इस बात की उपेक्षा नही थी की राजपूत सेना कश्यप-पुरा (मुल्तान) एवं सिन्धु नदी की सीमारेखा पर रक्षा कवच बने खड़े होंगे ग़जनी की सेना को संभालने का मौका तक नही मिला राजपूत सेना ने तीरों की बौछारें करने लग गये जिससे ग़जनी की सेना तितर बितर होगया इससे पहले की सालर हुसैन कुछ समझ पाते सालर हुसैन की समंदर जितना विशाल सेना आधा से ज्यादा राजपूत सेना की तीरों की बौछार से ख़तम होगये थे और आधी सेना को राजपूत सम्राट अजयराज चौहान की २५,००० पैदल सैन्यबल काल बनकर निगल गये सालर हुसैन की मृत्यु अजयराज चौहान के हाथो हुआ सालर हुसैन को परास्त कर कम्बोज (वर्त्तमान काबुल) पर आक्रमण कर कम्बोज से गजनी का शासक बहराम शाह को खदेड़ा । बहराम शाह ने खुद लिखा था “अजयराज चौहान की वजह से दिल्ली का तख्त ही नही सम्पूर्ण भारतवर्ष उनके हाथ से निकल गया था” Reference-: Period of Ghaznavids C.E. Bosworth Page-: 120
कुछ इतिहासकारों के अनुसार राजपूतो ने ग़जनी पर वापस अपना आधिपत्यं स्थापित कर लिया था और इतिहासकार लेविट डुसों (Lewitt Duson) Rajputana Ruler of Centuries के अनुसार अजयराज चौहान का शासन था ग़जनी पर परन्तु इस विषय में ज्यादा तथ्य ना मिलने के करण दावे के साथ कुछ नही कह सकती ।      
महाराजा अजयराज जी ने उम्र के आखिरी पङाव मे राज-काज छोड़ प्रभु भक्ति कि तरफ मुंह किया और योगी हो गए । उस जमाने में राजपूत जब इस उम्र में घर त्याग करते तो अपना घोड़ा व तलवार साथ रखते थे और सफेद वस्त्र धारण कर एकांत वास को चले जाते थे ।।
अजयराज चौहान को केवल अजयमेरु शहर के निर्माण के लिए जाना जाता हैं परन्तु कोई भी इतिहासकार जो भारत के सच्चे इतिहास का लेखन करते हैं उनमे से किसी ने भी सत्य को नही लिखा यहाँ तक राजपूत इतिहासकार भी चुक गये दशरथ शर्मा एवं मिन्हाज-ए-नसीरी , तारीख-ए-फिरीश्ता , पृथ्वीराजविजया , प्रबंधकोश के अलावा कही और नही मिलता हैं । अजयराज चौहान के सहशक्त राजा थे इन्होने साम्राज्य विस्तार के अलवा ग़जनी शासक के नागौर आक्रमण के बाद उन्होंने दूरदर्शिता से काम लेते हुए भारतवर्ष की सीमारेखा पर मजबूत सुरक्षाकवच का निर्माण किया । अजयराज को अपराजे सम्राट कहना कदापि गलत नही होगा बारहवीं सताब्दी जब भारत पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे थे मलेच्छ हमलावरों का उसवक्त अजयराज ने इन विदेशी आक्रमणकारियों का दमन कर भारत को मुक्त करवाया था । वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ऐसे अप्रतिम योद्धा के कृतियों को नज़रंदाज़ करने का फल आज हम सब भुगत रहे हैं भारत में अकबर , तैमुर , गोरी पैदा हो रहे हैं परन्तु हिन्दुओं में कोई अजयराज चौहान , वाक्पतिराज , पृथ्वीराज चौहान , महाराणा प्रताप , लक्ष्मीबाई , रानी कुरमदेवी जन्म नही ले पा रही हैं ।

अपने में अच्छी आदतें डालिए। (अंतिम भाग)

👉 अपने में अच्छी आदतें डालिए। (अंतिम भाग)

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 अपने में अच्छी आदतें डालिए। (अंतिम भाग)

🔵 आज जो आदतें पड़ी हुई हैं किसी समय वह भी नई रहीं होगी और उनको अपने पैर जमाने में अपने से पुरानी आदतों के साथ उसी प्रकार संघर्ष करना पड़ा होगा जैसा कि आज नई आदतें डालने की हमारी इच्छा को पुरानी आदतों से संघर्ष करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में निराश होने का कोई कारण नहीं। जब पूर्वकाल में पुरानी आदतों को हटाकर नई आदतें डालने में हम सफल हो चुके हैं तो कोई कारण नहीं कि अब फिर वैसा न किया जा सके।
🔴 ईश्वर का अस्तित्वजीवन की हर एक स्थिति मेंहर जगह और हर समय ध्यान में रखना हमारी एक स्वाभाविक आदत होनी चाहिए और इस आदत का बीजारोपण जीवन के शुरुआत से ही करना चाहिए। क्योंकि यह आदत जीवन की श्रेष्ठतम आदतों में सर्वोपरि महत्व की है।
🔵 जो मनुष्य ईश्वर पर विश्वास करता हैसदैव उसका ध्यान रखता हैहर जगह उसकी सत्ता को देखता है वह पाप कर्म नहीं कर सकता। जो ईश्वर विश्वासी है वह परम निर्भय रहता हैउसे मृत्यु काहानि कारोग कावियोग का,आक्रमण काठगी का या किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। ईश्वर भक्त सदा ही निर्भय और निर्बन्ध रहते हैं।
🔴 आप अच्छी आदतें डालिए। क्योंकि आदतों से ही मनुष्य की जीवन धारा का निर्माण होता है। ईश्वर परायणताआस्तिकता सब से अच्छी आदत हैक्योंकि उसके साथ-साथ वे सभी आदतें अपने आप अपने में आ जाती हैं जो जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए परम आवश्यक हैं।
🌹 समाप्त🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 28

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1949/June.28

👉 अपने में अच्छी आदतें डालिए। (भाग 1)

👉 अपने में अच्छी आदतें डालिए। (भाग 1)

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 अपने में अच्छी आदतें डालिए। (भाग 1)

🔵 पहले एक विचार उत्पन्न होता है फिर वह शारीरिक अभ्यास में लाया जाता है और बार-बार और लगातार दुहराया जाता है उसी को आदत नाम दिया गया है।
🔴 आदतबिजली की शक्ति के समान तेज और शक्तिशाली होती है। मनुष्य अपनी आदत का एक खिलौना बन जाता है और उसी के आधार पर उसके भविष्य का निर्माण होता है। कारण यह है कि उसे अपनी आदत के समान मित्र,साधनविचार और अवसर बराबर प्राप्त होते रहते हैं। एक सी आदत वालों में स्वाभाविक प्रेम और एक दूसरे के विरुद्ध आदत वालों में स्वाभाविक भिन्नता बिना किसी परिचय के ही पायी जाती है।
🔵 पुरानी आदतें नयी आदतों की बजाय अधिक शक्तिशाली होती हैं। जब कभी आप नई आदतों का बीजारोपण करना चाहते हैं तो पुरानी आदतें उसमें बार-बार बाधा डालती हैं और नई आदत को बढ़ने से रोकती हैं। जिससे वह नई आदत डालने वाला व्यक्ति घबरा कर निराश हो जाता है और जब तक वह आदत के सिद्धान्त और असलियत का अनुभव नहीं कर लेतासोचता है कि बदनसीब हैपरन्तु ऐसा सोचना भूल है।पुरानी आदतें जो आज इतनी प्रबल हो रही हैंएक दिन में नहीं पड़ गई हैं। काफी लम्बे समय तककाफी दिलचस्पी के साथ अनेकों बार उन्हें क्रिया रूप में परिणित किया गया है तब वे आज इतनी मजबूत बन पाई हैं कि हमारे मन पर वे अधिकार जमा सकीं है और नई आदतों को न जगने देने के लिए संघर्ष करती हैं। इससे सिद्ध होता है कि कोई भी आदत तब मजबूत होती है जब उसका पर्याप्त समय तक कार्य रूप में अभ्यास किया जाता है।
🌹 क्रमशः जारी🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 28



भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है। (अंतिम भाग)

👉 भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है। (अंतिम भाग)

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है। (अंतिम भाग)

🔵 जो लोग सफलता के मार्ग में होने वाले विलम्ब की धैयपूर्वक प्रतीक्षा नहीं कर सकतेजो लोग अभीष्ट प्राप्ति के पथ में आने वाली बाधाओं से लड़ना नहीं जानते वे अपनी अयोग्यता और ओछेपन को बेचारे भाग्य के ऊपर थोप कर स्वयं निर्दोष बनने का उपहासास्पद प्रयत्न करते हैं। ऐसी आत्म वंचना से लाभ कुछ नहीं हानि अपार है। सबसे बड़ी हानि यह है कि अपने को अभागा मानने वाला मनुष्य आशा के प्रकाश से हाथ धो बैठता है और निराशा के अन्धकार में भटकते रहने के कारण इष्ट प्राप्ति से कोसों पीछे रह जाता है।
🔴 इतिहास पर दृष्टिपात कीजिए,जिन महापुरुषों ने बड़े-बड़े कार्य किये हैं उन्होंने एक से एक बढ़कर आपत्तियों को झेला है। यदि वे हर एक कठिनाई के समय ऐसा सोचते कि हमारे भाग्य में यदि सफलता बंधी होती तो यह बाधा क्यों उपस्थित होतीइसलिए जब कोई बात भाग्य में ही नहीं है तो प्रयत्न क्यों करे?” विचार कीजिए कि ऐसी मान्यता यदि उन्होंने रखी होती तो क्या वे इतने महान बने होते?
🔵 बाधाएंकठिनाइयाँआपत्तियाँ और असफलताएं एक प्रकार की कसौटी हैं जिन पर पात्र-कुपात्र की खरे-खोटे की परख होती है। जो इस कसौटी पर खरे उतरते हैंसफलता के अधिकारी सिद्ध होते हैं उन्हें ही इष्ट की प्राप्ति होती है। जो सस्ती सफलता के फिराक में रहते हैंबिना अड़चन और स्वल्प प्रयत्न में जो मनमाने मनसूबे पूरे करना चाहते हैं वे न तो प्रकृति के नियमों को समझते हैं न ईश्वरीय विधान को। उन्हें जानना चाहिए कि कायर पुरुष भाग्य की दुहाई देते रहते हैं और उद्योगी पुरुष सिंह विजय लक्ष्मी प्राप्त करते हैं।
🌹 समाप्त🌹 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949पृष्ठ 30
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👉 पक्षपात किया जाए तो इस तरह
🔴 किसी ने आक्षेप लगाया संत विनोबा पर "विनोबा जी तो शत्रु का पक्ष लेने की बात कहते हैं।" विनोबा जी ने सुना और एक स्थान पर उसका स्पष्टीकरण भी दे दिया। उन्होंने बतलाया पक्ष न लिया जाए यह अच्छा है किन्तु यदि लेना पडे तो शत्रु का ही लेने योग्य है। मित्र का क्या पक्ष लिया जाए-वह तो अपना है ही। मित्र के पक्ष में तो बुद्धि सहज हो जाती?प्रयासपूर्वक शत्रु के पक्ष मे लगाने पर ही पक्षपात से आंशिक मुक्ति पाई जा सकती है।
🔵 समाधान बहुत प्रमाणिक तथा विवेकपूर्ण ढंग से किया गया है। संत विनोबा की बुद्धि तथा विवेक पर......Read Full Story Please Click👇👇👇👇👇👇👇
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👉 भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है। (भाग 1)

👉 भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है। (भाग 1)

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 भाग्य का निर्माण अपने हाथ में है। (भाग 1)

🔵 अनेक बार छोटी-मोटी असफलता मिलने तथा अभाव ग्रस्त होने पर लोग ऐसा कहने लगते हैं- ”क्या करेंहमारे भाग्य में ही ऐसा लिखा हैहमें ऐसी ही हीन स्थिति में रहना पड़ेगा। यदि हमारे भाग्य में सफलता बंधी होती तो अब तक के प्रयत्न असफल क्यों होते?” ऐसे अदूरदर्शी मनुष्य भाग्यवाद के गूढ़ सिद्धान्तों को नहीं समझते और न यह समझते हैं कि इस प्रकार की मान्यता बना लेने के कारण वे किस प्रकार अपने भविष्य के निर्माण में भारी बाधा उपस्थित कर रहे हैं। ऐसे लोग मार्ग की बाधाओं का मुकाबला नहीं कर सकते।
🔴 सफलता की देवी का प्रसन्न करने के लिए पुरुषार्थ की भेंट चढ़ानी पड़ती है। जो मनुष्य पुरुषार्थी नहीं हैप्रयत्न और परिश्रम में दृढ़ता नहीं रखता वह स्थायी सफलता का अधिकारी नहीं हो सकता। यदि अनायास किसी प्रकार कोई सम्पत्ति उसे प्राप्त हो भी जाय तो वह उससे संतोषजनक लाभ नहीं उठा सकता। वह ऐसे ही अनायास चली जाती है जैसे कि अनायास आई थी।
🔵 रोटी का स्वाद वह जानता है जिसने परिश्रम करने के पश्चात् क्षुधार्त होकर ग्रास तोड़ा हो। धन का उपयोग वह जानता है जिसने पसीना बहाकर कमाया हो।सफलता का मूल्याँकन वही कर सकता है जिसने अनेकों कठिनाइयोंबाधाओं और असफलताओं से संघर्ष किया हो। जो विपरीत परिस्थितियों और बाधाओं के बीच मुस्कराते रहना और हर असफलता के बाद दूने उत्साह से आगे बढ़ना जानता है। वस्तुतः वही विजयलक्ष्मी का अधिकारी होता है।
🌹 क्रमशः जारी🌹 अखण्ड ज्योति सितम्बर 1949 पृष्ठ30


👉 शैतानियत से इस तरह निपटा जाए
🔴 अल कैपोन जिस रास्ते निकल जाता लोग रास्ता छोड देते। जिस पदाधिकरी से भेंट से जातीउसके प्राण सूख जाते। पुलिस और न्यायाधीश उसकी दृष्टि से उसका बचाव करते थे। बड़ा खूंखार और बेईमान था वह व्यक्ति। उसके गिरोह में कितने बदमाश थेइसका पता भी नहीं चल सकता था। वह अकेले अवैध शराब के धंधे में ही ३ करोड डालर प्रतिवर्ष कमाता थापर क्या मजाल कि कोई अधिकारी उस पर चूँ कर जाए। सब उसकी कृपा-दृष्टि के लिए लालायित रहा करते थे।
🔵 स्वस्थ और बलवान् रहा होगा पर वह कोई......Read Full Story Please Click👇👇👇👇👇👇👇
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Thursday, February 9, 2017

👉 मन को सदा सद्विचारों में संलग्न रखिये?

👉 मन को सदा सद्विचारों में संलग्न रखिये?

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 मन को सदा सद्विचारों में संलग्न रखिये?

🔵 मनुष्य जब तक जीवित रहता है सर्वदा कार्य में संलग्न रहता हैचाहे कार्य शुभ हो या अशुभ। कुछ न कुछ कार्य करता ही रहता है और अपने कर्मों के फलस्वरूप दुःख सुख पाता रहता हैबुरे कर्मों से दुःख एवं शुभ कर्मों से सुख।
🔴 जब हम ईश्वर की आज्ञानुसार कर्म करते हैं तो हमें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है क्योंकि वे कार्य शुभ होते हैं परन्तु जब हम उनकी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करते हैं तभी दुःखी होते हैंदुःख से छुटकारा पाने के लिये हमें सदैव यह प्रयत्न करना चाहिए कि हम बुराइयों से बचें।
🔵 ईश्वर आज्ञा देता है कि “हे मनुष्यों! इस संसार में सत्कर्मों को करते हुए 100 वर्ष तक जीने की इच्छा करो। सत्कर्म में कभी आलसी और प्रमादी मत बनोजो तुम उत्तम कर्म करोगे तो तुम्हें इस उत्तम कर्म से कभी भी दुःख नहीं प्राप्त हो सकता है।अतः शुभ कार्य से कभी वंचित न रहो।”
🔴 हम लोगों का सबसे बढ़कर सही कर्त्तव्य है कि हम मन को किसी क्षण कुविचारों के लिए अवकाश न दें क्योंकि जिस समय हमें शुभ कर्मों से अवकाश मिलेगा उसी समय हम विनाशकारी पथ की ओर अग्रसर होंगे।
🔵 मनुष्य का जीवन इतना बहुमूल्य है कि बार-बार नहीं मिलतायदि इस मनुष्य जीवन को पाकर हम ईश्वर की आज्ञा न मानकर व्यर्थ कर्मों में अपने समय को बरबाद कर रहे हैं तो इससे बढ़कर और मूर्खता क्या है? इससे तो पशु ही श्रेष्ठ है जिनसे हमें परोपकार की तो शिक्षा मिलती है।
🔴 हमारे जीवन का उद्देश्य सर्वदा अपनी तथा दूसरों की भलाई करना है। क्योंकि जो संकुचित स्वार्थ से ऊंचे उठकर उच्च उद्देश्यों के लिए उदार दृष्टि से कार्य करते हैं वे ही ईश्वरीय ज्ञान को पाते हैं और वही संसार के बुरे कर्मों से बचकर शुभ कर्मों को करते हुए आनन्द को उपलब्ध करते हैं। जो प्रत्येक जीव के दुःख को अपना दुःख समझता है तथा प्रत्येक जीव में आत्मभाव रखता है अथवा परमपिता परमात्मा को सदैव अपने निकट समझता है वह कभी पाप कर्म नहीं करता जब पाप कर्म नहीं तो उसका फल दुःख भी नहीं। इसलिए हमें सदा ईश्वर परायण होना चाहिए और सद्विचारों में निमग्न रहना चाहिए जिससे मानव जीवन का महान लाभ उपलब्ध किया जा सके।
🌹 अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 19
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1949/March/v1.19


दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (अन्तिम भाग)

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (अन्तिम भाग)

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (अन्तिम भाग)

🔵 किसी में गुण की कल्पना न कर सकने के कारण दोषदर्शी अविश्वासी भी होता है। वह किसी की सद्भावना एवं सहानुभूति में भी कान खड़े करने लगता है। प्रेम एवं प्रशंसा में भी स्वार्थपूर्ण चाटुकारिता का दोष देखता है। इसलिये संपर्क में आने और स्नेहपूर्ण बरताव करने वाले हर व्यक्ति से भयाकुल और शंकाकुल रहा करता है। उसे विश्वास ही नहीं होता कि संसार में कोई निःस्वार्थ और निर्दोष-भाव से मिल कर हितकारी सिद्ध हो सकता है। विश्वासआस्थाश्रद्धासराहना से रहित व्यक्ति का खिन्न असंतुष्ट और व्यग्र रहना स्वाभाविक ही हैजैसा कि दोष-दर्शी रहता भी है।
🔴 यदि आपको अपने अन्दर इस प्रकार की दुर्बलता दिखी हो तो तुरन्त ही उसे निकालने के लिए और उसके स्थान पर गुण-ग्राहकता का गुण विकसित कीजिये। इस दशा में आपको हर व्यक्तिवस्तु और वातावरण में आनंदप्रशंसा अथवा विनोद की कुछ-न-कुछ सामग्री मिल ही जायेगी। दूसरों के गुण-दोषों में से उस हंस की तरह केवल गुण ही ग्रहण कर सकेंगेजोकि पानी मिले हुए दूध में से केवल दूध-दूध ही ग्रहण कर लेता है और पानी छोड़ देता है।
🔵 दूसरों की अच्छाइयों को खोजने,उनको देख-देख प्रसन्न होने और उनकी सराहना करने का स्वभाव यदि अपने अन्दर विकसित कर लिया जाये तो आज दोष-दर्शन के कारण जो संसारजो वस्तु और जो व्यक्ति हमें काँटे की तरह चुभते हैंवे फूल की तरह प्यारे लगने लगें। जिस दिन यह दुनिया हमें प्यारी लगने लगेगीइसमें दोष,दुर्गुण कम दिखाई देंगेउस दिन हमारे हृदय से द्वेष एवं घृणा का भाव निकल जायेगा और हमें हर दिशा और हर वातावरण में प्रसन्नता ही आने लगेगी।दुःखक्लेश और क्षोभरोष का कोई कारण ही शेष न रह जायेगा।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य🌹 अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 24 





"चलते रहे कदम तो,

"चलते रहे कदम तो,               किनारा जरुर मिलेगा !! अन्धकार से लड़ते रहो,               सवेरा जरुर खिलेगा !! जब ठान लिया मंजिल प...