*Happy Thoughts*
🌧 *क्षमा का जादू* 🌧
*क्षमा माँगने की क्षमता को जानकर हर दुःख से मुक्ति पाएँ* (Say Sorry Within and Be Free) *By सरश्री*
*{क्षमा साधना के आवश्यक गुण - विश्वास की ताक़त} - 2(10)*
🔺 यदि आप क्षमा साधने के द्वारा लकीरों से मुक्त होना चाहते हैं, तो आपकी साधना में कुछ गुणों का समावेश होना ज़रूरी है। समझिए, ये गुण क्षमा साधना की इमारत के मज़बूत खंभे हैं। इन गुणों के अभाव में क्षमा साधना पूर्ण सफल नहीं हो पाती है। ये गुण इस प्रकार हैं -
*भाव*
भाव ईश्वर की भाषा है। प्रार्थना में ईश्वर आपके भावों को ग्रहण करता है, शब्दों को नहीं इसलिए क्षमा प्रार्थना पूरे भाव से करें, सिर्फ़ ऊपरी शब्दों से नहीं। यदि आप किसी को कह रहे हैं, 'मैंने तुम्हें क्षमा किया' तो यह भाव के स्तर पर क्षमा करना हो। ऐसा नहीं कि बाहर से कह दिया और अंदर अभी भी बड़बड़ चल ही रही है। *बिना भाव के प्रार्थना करना, प्रार्थना का असर कम करता है।*
कभी-कभी हमारे अंदर प्रार्थना करते हुए भी अवरोध उठते हैं। कई बार हम प्रार्थना के शब्दों को लेकर सहज नहीं होते। जब प्रार्थना में ही प्रतिरोध होता है तो वह हृदय से नहीं बल्कि मजबूरी में बोली जाती है। अतः प्रार्थना में वे ही शब्द बोलें जिनके साथ आप सहज हैं, जिनसे आपके भाव प्रकट होते हैं। प्रार्थना से पहले यह प्रार्थना करें-
'हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना भावपूर्ण हो और उसके उत्तम परिणाम दो।'
आइए, भाव के महत्त्व को एक कहानी से समझते हैं।
एक गाँव में नदी किनारे एक सुंदर चर्च था। चर्च में एक फ़ादर रहते थे। एक दिन उन्होंने सुना कि नदी के उस पार तीन साधु रहते हैं। वे लोगों को प्रार्थना सिखाते हैं। गाँव के और आस-पास के बहुत से लोग उनके पास जाकर प्रार्थना सीख रहे हैं। तीनों साधुओं की लोकप्रियता आए दिन बढ़ती जा रही है। ये बातें सुनकर फ़ादर को बड़ा दुःख हुआ। उन्हें लगा कि गाँव में मेरे होते हुए लोग इतनी दूर नदी पार करके उन साधुओं के पास कौन सी प्रार्थना सीखने जाते हैं। फ़ादर की उत्सुकता बढ़ने लगी।
एक दिन फ़ादर ने खुद साधुओं से मिलने की ठान ली और वे नाव में बैठकर नदी पार कर उनके पास गए। उन्होंने साधुओं से पूछा, 'आप लोगों को कौन सी प्रार्थना सिखाते हैं?' तब साधुओं ने उन्हें अपनी प्रार्थना बताई, 'तुम तीन हो, हम तीन हैं, हमे क्षमा करो।' साधुओं की प्रार्थना सुनकर फ़ादर हँस पड़े। कहने लगे, 'यह भी कोई प्रार्थना है? प्रार्थना ऐसी नहीं होती।' तब साधुओं ने कहा, 'हमें तो नहीं मालूम प्रार्थना कैसी होती है, अब आप ही हमें सही प्रार्थना सिखाइए।'
फ़ादर साधुओं को प्रार्थना सिखाने लगे। बड़ी लंबी प्रार्थना, उसमें कई सारे शब्द, कई सारे वाक्य, अलंकारों से सुसज्जित भाषा... फ़ादर सिखा रहे थे, साधु उसे याद करने की कोशिश कर रहे थे। भूल जाते थे, फिर याद करते थे, फिर भूल जाते थे। बड़ी मेहनत के बाद फ़ादर ने उन्हें वह लंबी प्रार्थना याद करवाई और वे नाव में बैठकर गाँव की ओर चल पड़े।
फ़ादर की नाव जब नदी के मध्य में पहुँची तब उन्होंने सुना कि उन्हें कोई पुकार रहा है। उन्होंने आवाज़ की तरफ़ देखा तो वे तीन साधु फ़ादर को आवाज दे रहे थे क्योंकि फ़ादर की सिखाई प्रार्थना वे फिर से भूल गए थे। इसलिए वे दौड़े-दौड़े फ़ादर के पास आ रहे थे... बिना नाव के... पानी की और चलते हुए...! जैसे ही वे फ़ादर की नाव तक पहुँचे, उन्होंने फ़ादर को फिर से प्रार्थना सिखाने की विनती की। लेकिन फ़ादर उन्हें पानी पर चलता देखकर स्तब्ध रह गए, उन्होंने साधुओं की साधना की शक्ति को जान लिया था।
फ़ादर ने उन्हें कहा, 'हे साधुओं, तुम्हें मेरी लंबी प्रार्थना सीखने की ज़रूरत नहीं। तुम्हारी छोटी प्रार्थना में बड़ी शक्ति है, वही सही है। *तुम तीन, हम तीन, क्षमा करो।*
असल में इस प्रार्थना से तुम तीन, हम तीन ये शब्द निकाल दिए तो भी चलेगा। असली प्रार्थना तो केवल इतनी ही है कि 'क्षमा करो' क्योंकि प्रेम, आनंद, मुक्ति देनेवाली क्षमा साधने ही सही प्रार्थना है।
इस कहानी में प्रार्थना में भाव का महत्त्व पता चलता है। तीनों साधु के शब्द पर्याप्त थे या नहीं थे किंतु उनके भाव पूर्ण थे इसलिए उनकी प्रार्थना में शक्ति थी, वह फलित होती थी। यह बात फ़ादर की भी समझ में आ गई।
बहुत से लोग सदियों से चली आ रही संस्कृत या अन्य ऐसी भाषा की प्रार्थनाएँ, मंत्र या श्लोक रोज़ाना दोहराते हैं, जिनका उन्हें अर्थ भी पता नहीं होता। अब ज़रा सोचकर देखिए, जिन शब्दों का अर्थ भी नहीं मालूम, उन्हें दोहराने से भाव कहाँ से पैदा होगा। फिर लोग भगवान से शिकायत करते हैं कि 'इतनी प्रार्थनाएँ की और फल नहीं आया।' वास्तव में सत्य तो यह है कि भगवान भाव समझता है। जब आपके भाव उस तक पहुँचे ही नहीं तो भला वह प्रार्थना पूरी कैसे करेगा।
🙏🏼 *धन्यवाद...