Saturday, February 11, 2017

*Happy Thoughts* 🌧 *क्षमा का जादू* 🌧

*Happy Thoughts*

🌧 *क्षमा का जादू* 🌧

*क्षमा माँगने की क्षमता को जानकर हर दुःख से मुक्ति पाएँ* (Say Sorry Within and Be Free) *By सरश्री*

*{क्षमा साधना के आवश्यक गुण - विश्वास की ताक़त} - 2(10)*

🔺 यदि आप क्षमा साधने के द्वारा लकीरों से मुक्त होना चाहते हैं, तो आपकी साधना में कुछ गुणों का समावेश होना ज़रूरी है। समझिए, ये गुण क्षमा साधना की इमारत के मज़बूत खंभे हैं। इन गुणों के अभाव में क्षमा साधना पूर्ण सफल नहीं हो पाती है। ये गुण इस प्रकार हैं -

*भाव*

भाव ईश्वर की भाषा है। प्रार्थना में ईश्वर आपके भावों को ग्रहण करता है, शब्दों को नहीं इसलिए क्षमा प्रार्थना पूरे भाव से करें, सिर्फ़ ऊपरी शब्दों से नहीं। यदि आप किसी को कह रहे हैं, 'मैंने तुम्हें क्षमा किया' तो यह भाव के स्तर पर क्षमा करना हो। ऐसा नहीं कि बाहर से कह दिया और अंदर अभी भी बड़बड़ चल ही रही है। *बिना भाव के प्रार्थना करना, प्रार्थना का असर कम करता है।*

कभी-कभी हमारे अंदर प्रार्थना करते हुए भी अवरोध उठते हैं। कई बार हम प्रार्थना के शब्दों को लेकर सहज नहीं होते। जब प्रार्थना में ही प्रतिरोध होता है तो वह हृदय से नहीं बल्कि मजबूरी में बोली जाती है। अतः प्रार्थना में वे ही शब्द बोलें जिनके साथ आप सहज हैं, जिनसे आपके भाव प्रकट होते हैं। प्रार्थना से पहले यह प्रार्थना करें-

'हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना भावपूर्ण हो और उसके उत्तम परिणाम दो।'

आइए, भाव के महत्त्व को एक कहानी से समझते हैं।

एक गाँव में नदी किनारे एक सुंदर चर्च था। चर्च में एक फ़ादर रहते थे। एक दिन उन्होंने सुना कि नदी के उस पार तीन साधु रहते हैं। वे लोगों को प्रार्थना सिखाते हैं। गाँव के और आस-पास के बहुत से लोग उनके पास जाकर प्रार्थना सीख रहे हैं। तीनों साधुओं की लोकप्रियता आए दिन बढ़ती जा रही है। ये बातें सुनकर फ़ादर को बड़ा दुःख हुआ। उन्हें लगा कि गाँव में मेरे होते हुए लोग इतनी दूर नदी पार करके उन साधुओं के पास कौन सी प्रार्थना सीखने जाते हैं। फ़ादर की उत्सुकता बढ़ने लगी।

एक दिन फ़ादर ने खुद साधुओं से मिलने की ठान ली और वे नाव में बैठकर नदी पार कर उनके पास गए। उन्होंने साधुओं से पूछा, 'आप लोगों को कौन सी प्रार्थना सिखाते हैं?' तब साधुओं ने उन्हें अपनी प्रार्थना बताई, 'तुम तीन हो, हम तीन हैं, हमे क्षमा करो।' साधुओं की प्रार्थना सुनकर फ़ादर हँस पड़े। कहने लगे, 'यह भी कोई प्रार्थना है? प्रार्थना ऐसी नहीं होती।' तब साधुओं ने कहा, 'हमें तो नहीं मालूम प्रार्थना कैसी होती है, अब आप ही हमें सही प्रार्थना सिखाइए।'

फ़ादर साधुओं को प्रार्थना सिखाने लगे। बड़ी लंबी प्रार्थना, उसमें कई सारे शब्द, कई सारे वाक्य, अलंकारों से सुसज्जित भाषा... फ़ादर सिखा रहे थे, साधु उसे याद करने की कोशिश कर रहे थे। भूल जाते थे, फिर याद करते थे, फिर भूल जाते थे। बड़ी मेहनत के बाद फ़ादर ने उन्हें वह लंबी प्रार्थना याद करवाई और वे नाव में बैठकर गाँव की ओर चल पड़े।

फ़ादर की नाव जब नदी के मध्य में पहुँची तब उन्होंने सुना कि उन्हें कोई पुकार रहा है। उन्होंने आवाज़ की तरफ़ देखा तो वे तीन साधु फ़ादर को आवाज दे रहे थे क्योंकि फ़ादर की सिखाई प्रार्थना वे फिर से भूल गए थे। इसलिए वे दौड़े-दौड़े फ़ादर के पास आ रहे थे... बिना नाव के... पानी की और चलते हुए...! जैसे ही वे फ़ादर की नाव तक पहुँचे, उन्होंने फ़ादर को फिर से प्रार्थना सिखाने की विनती की। लेकिन फ़ादर उन्हें पानी पर चलता देखकर स्तब्ध रह गए, उन्होंने साधुओं की साधना की शक्ति को जान लिया था।

फ़ादर ने उन्हें कहा, 'हे साधुओं, तुम्हें मेरी लंबी प्रार्थना सीखने की ज़रूरत नहीं। तुम्हारी छोटी प्रार्थना में बड़ी शक्ति है, वही सही है। *तुम तीन, हम तीन, क्षमा करो।*

असल में इस प्रार्थना से तुम तीन, हम तीन ये शब्द निकाल दिए तो भी चलेगा। असली प्रार्थना तो केवल इतनी ही है कि 'क्षमा करो' क्योंकि प्रेम, आनंद, मुक्ति देनेवाली क्षमा साधने ही सही प्रार्थना है।

इस कहानी में प्रार्थना में भाव का महत्त्व पता चलता है। तीनों साधु के शब्द पर्याप्त थे या नहीं थे किंतु उनके भाव पूर्ण थे इसलिए उनकी प्रार्थना में शक्ति थी, वह फलित होती थी। यह बात फ़ादर की भी समझ में आ गई।

बहुत से लोग सदियों से चली आ रही संस्कृत या अन्य ऐसी भाषा की प्रार्थनाएँ, मंत्र या श्लोक रोज़ाना दोहराते हैं, जिनका उन्हें अर्थ भी पता नहीं होता। अब ज़रा सोचकर देखिए, जिन शब्दों का अर्थ भी नहीं मालूम, उन्हें दोहराने से भाव कहाँ से पैदा होगा। फिर लोग भगवान से शिकायत करते हैं कि 'इतनी प्रार्थनाएँ की और फल नहीं आया।' वास्तव में सत्य तो यह है कि भगवान भाव समझता है। जब आपके भाव उस तक पहुँचे ही नहीं तो भला वह प्रार्थना पूरी कैसे करेगा।

🙏🏼 *धन्यवाद... 

महाराणा हम्मीरदेव ने अपने पौरुष के द्वारा खिलजी से चित्तौड़ को पुनः जीत लिया, इस मौके की एक ओजस्वी रचना- ‘भजन इतिहास महारानी पद्मिनी’ से ठेठ हरयाणवी तर्ज में

महाराणा हम्मीरदेव ने अपने पौरुष के द्वारा खिलजी से चित्तौड़ को पुनः जीत लिया, इस मौके की एक ओजस्वी रचना- ‘भजन इतिहास महारानी पद्मिनी’ से ठेठ हरयाणवी तर्ज में

रचना: स्व0 पं0 चन्द्रभानु आर्योपदेशक संस्थापक शांतिधर्मी

खिलजी का रंग, कर दिया भंग, जंग जीत कै गया हमीर।।टेक।।
करकै तलाश गया बनोवास वह राणा जी के पास।
करकै नाश शत्रु का खास ये मिटा दिया संत्रास।
अजयसिंह का ख्याल पहुंचा तत्काल आ मेरे लाल रणधीर।।1।।
शत्रु को मोड़ ले ली चित्तौड़ जब सुन पाया ये बात।
तैने मेरे चन्द दिए काट फंद बस आनन्द होग्या गात।
ये तेरी खलक किया राजतिलक बस अपनी अंगुली चीर।।2।।
बेटा तू है ढेठा, जेठा फेटा मुझसे आन।
गौ भक्षक को कर तक्षक तेरा रक्षक है भगवान।
तनै मेरी लाज ली बचा आज तुम करो राज मेरे वीर।।3।।
धरकै ध्यान सुनलो जवान ये होते हैं बलवान।
आन बान और शान की खातिर हो जाते कुर्बान।।
कहै चन्द्रभान जरा करकै कान पहचान मेरी तकरीर।।4।।

देशी गाय और विदेशी जर्सी गाय -------

देशी गाय और विदेशी जर्सी गाय -------
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         मित्रो सच यह है की ये जर्सी गाय -- गाय नहीं ये पूतना है !!
सबसे पहले आप ये जान लीजिये की स्वदेशी गाय और विदेशी जर्सी गाय (सूअर ) की पहचान क्या है ? देशी और विदेशी गाय को पहचानने की जो बड़ी निशानी है वो ये की देशी गाय की पीठ पर मोटा सा हम्प होता है जबकि जर्सी गाय की पीठ समतल होती है ! आपको जानकर हैरानी होगी दुनिया मे भारत को छोड़ जर्सी गाय का दूध को नहीं पीता ! जर्सी गाय सबसे ज्यादा डैनमार्क ,न्यूजीलैंड , आदि देशो मे पायी जाती है ! डैनमार्क मे तो कुल लोगो की आबादी से ज्यादा गाय है ! और आपको ये जानकार हैरानी होगी की डैनमार्क वाले दूध ही नहीं पीते ! क्यों नहीं पीते ? क्योंकि कैंसर होने की संभवना है ,घुटनो कर दर्द होना तो आम बात है ! मधुमेह (शुगर होने का बहुत बड़ा कारण है ये जर्सी गाय का दूध ! डैनमार्क वाले चाय भी बिना दूध की पीते है ! डैनमार्क की सरकार तो दूध ज्यादा होने पर समुद्र मे फेंकवा देती है वहाँ एक बात  बहुत प्रचलित है ----milk is a white poison !

और जैसा की आप जानते है भारत मे 36000 कत्लखानों मे हर साल 2 करोड़ 50 लाख गाय काटी जाती है और जो 72 लाख मीट्रिक टन मांस का उत्पादन होता है वो सबसे ज्यादा अमेरिका और उसके बाद यूरोप और फिर अरब देशों मे भेजा जाता है ! आपके मन मे सवाल आएगा कि ये अमेरिका वाले अपने देश की गाय का मांस क्यो नहीं खाते ?

दरअसल बात ये है की यूरोप और अमेरिका की जो गाय है उसको बहुत गंभीर बीमारियाँ है और उनमे एक बीमारी का नाम है Mad cow disease ! इस बीमारी से गाय के सींघ और पैरों मे पस पर जाती और घाव हो जाते हैं सामान्य रूप से जर्सी गायों को ये गंभीर बीमारी रहती है अब इस बीमारी वाली गाय का कोई मांस अगर खाये तो उसको इससे भी ज्यादा गंभीर बीमारियाँ हो सकती है ! इस लिए यूरोप और अमेरिका के लोग आजकल अपने देश की गाय मांस कम खाते हैं भारत की गाय के मांस की उन्होने ज्यादा डिमांड है ! क्योंकि भारत की गायों को ये बीमारी नहीं होती है ! आपको जानकार हैरानी होगी जर्सी गायों को ये बीमारी इस लिए होती है क्योंकि उसको भी मांसाहारी भोजन करवाया जाता है ताकि उनके शरीर मे मांस और ज्यादा बढ़े ! यूरोप और अमेरिका के लोग गाय को मांस के लिए पालते है मांस उनके लिए प्राथमिक है दूध पीने की वहाँ कोई परंपरा नहीं है वो दूध पीना अधिक पसंद भी नहीं करते !!

तो जर्सी गाय को उन्होने पिछले 50 साल मे इतना मोटा बना दिया है की वे भैंस से भी ज्यादा बत्तर हो गई है ! यूरोप की गाय की जो मूल प्रजातियाँ है holstein friesian ,jarsi ये बिलकुल विचित्र किसम की है उनमे गाय का कोई भी गुण नहीं बचा है ! जितने दुर्गुण भैंस मे होते हैं वे सब जर्सी गाय मे दिखाई देते हैं !
उदाहरण के लिए जर्सी गाय को अपने बचे से कोई लगाव नहीं होता और जर्सी गाय अपने बच्चे को कभी पहचानती भी नहीं ! कई बार ऐसा होता है की जर्सी गाय का बच्चा किसी दूसरी जर्सी गाय के साथ चला जाए उसको कोई तकलीफ नहीं !

लेकिन जो भारत की देशी गाय है वो अपने बच्चे से इतना प्रेम करती है इतना लगाव रखती है की अगर उसके बच्चे को किसी ने बुरी नजर से भी देखा तो वो मार डालने के लिए तैयार हो जाती है ! देशी गाय की जो सबसे बड़ी विशेषता है वो ये की वह लाखो की भीड़ मे अपने बच्चे को पहचान लेती है और लाखो की भीड़ मे वो बच्चा अपनी माँ को पहचान लेता हैं ! जर्सी गाय कभी भी पैदल नहीं चल पाती ! चलाने की कोशिश करो तो बैठ जाती है ! जबकि भारतीय गाय की ये विशेषता है उसे कितने भी ऊंचे पहाड़ पर चढ़ा दो चढ़ती चली जाएगी !

कभी आप हिमालय पर्वत की परिक्रमा करे जितनी ऊंचाई तक मनुष्य जा सकता है उतनी ऊंचाई तक आपको देशी गाय देखने को मिलेगी ! आप ऋषिकेश ,बद्रीनाथ ,आदि जाए जितनी ऊंचाई पर जाए 8000 -9000 फिट तक आपको देशी गाय देखने को मिलेगी ! जर्सी गाय को 10 फिट ऊपर भी  चढ़ना पड़े तो तकलीफ आ जाती है
जर्सी गाय का पूरा का पूरा स्वभाव भैंस जैसा है बहुत बार ऐसा होता है जर्सी गाय सड़क पर बैठ जाये और पीछे से लोग होरन बजा बजा कर पागल हो जाते है लेकिन वो नहीं हटती ! क्योंकि हटने के लिए जो i q चाहिए वो उसमे नहीं है !!

सामान्य रूप से ये जो जर्सी गाय उसके बारे मे यूरोप के लोग ऐसा मानते है की इसको विकसित किया गया है डुकर (सूअर )के जीन से ! भगवान ने गाय सिर्फ भारत को दी है और आपको सुन कर हैरानी होगी ये जितनी भी जर्सी गाय है यूरोप और अमेरिका मे इनका जो वंश बढ़ाया गया है वो सब artificial insemination से बढ़ाया गया और आप सब जानते है artificial insemination मे ये गुंजाइश है की किसी भी जानवर का जीन चाहे घोड़े ,का चाहें सूअर का उसमे डाल सकते है ! तो इसे सूअर से विकसित किया गया है ! और artificial  insemination से भी उसको गर्भवती बनाया जाता है ये उनके वहाँ पिछले 50 साल से चल रहा है !!
यूरोप और अमेरिका के भोजन विशेषज्ञ (nutrition expert ) हैं ! उनका कहना है की अगर जर्सी गाय का भोजन करे तो 15 से 20 साल मे कैंसर होने की संभवना ,घुटनो का दर्द तो तुरंत होता है। sugar,  arthritis, ashtma और ऐसे 48 रोग होते है इसलिए उनके देश मे आजकल एक अभियान चल रहा है की अपनी गाय का मांस कम खाओ और भारत की सुरक्षित गाय मांस अधिक खाओ ! इसी लिए यूरोपियन कमीशन ने भारत सरकार के साथ समझोता कर रखा है और हर साल भारत से 72 लाख मीट्रिक टन मांस का निर्यात होता है जिसके लिए 36000 कत्लखाने इस देश मे चल रहें हैं !!

तो मित्रो उनके देश के लोग ना तो आजकल अपनी गाय का मांस खा रहे हैं और ना ही दूध पी रहें हैं ! और हमारे देश के नेता इतने हरामखोर है की एक तरह तो अपनी गाय का कत्ल करवा रहें हैं और दूसरी तरफ उनकी सूअर जर्सी गाय को भारत मे लाकर हमे बर्बाद करने मे लगे है ! पंजाब और गुजरात से सबसे ज्यादा जर्सी गाय है ! और एक गंभीर बात आपको सुन कर हैरानी होगी भारत की बहुत सी घी बेचने वाली कंपनियाँ बाहर से जर्सी गाय का दूध import करती है !

दूध को दो श्रेणियों मे बांटा गया है A1 और A2 !
A1 जर्सी का A2 भारतीय देशी गाय का !

तो होता ये है की इन कंपनियो को अधिक से अधिक रोज घी बनाना है अब इतनी गाय को संभालना उनका पालण पोषण करना वो सब तो इनसे होता नहीं ! और ना ही इतनी गाय ये डेयरी मे रख सकते है। तो ये लोग क्या करते है डैनमार्क आदि देशो से A1 दूध (जर्सी गाय ) का मँगवाते है powder (सूखा दूध )के रूप मे ! उनसे घी बनाकर हम सबको बेच रहें है ! और हम सबकी मजबूरी ये है की आप इनके खिलाफ कुछ कर नहीं सकते क्योंकि भारत मे कोई ऐसा कानून नहीं बना जो ये कहता है की जर्सी गाय का दूध A1 नहीं पीना चाहिए ! अगर कानून होगा तो ही आप कुछ करोगे ना ? यहाँ A1 – को जाँचने की लैब तक नहीं ! नेता लोग देश बेचने में लगे हैं। गाय की पहचान हमने ऊपर बताई थी की उसकी पीठ पर मोटा सा हम्प होता है ! दरअसल ये हम्प ही सूर्य से कुछ अलग प्रकार की तिरंगे लेता है वही उसके दूध ,मूत्र और गोबर को पवित्र बनाती है जिससे उसमे इतने गुण है ! गौ माता सबसे पहले समुन्द्र मंथन से निकली थी जिसे कामधेनु कहते है गौ माता को वरदान है की इसके शरीर से निकली कोइ भी वस्तु बेकार नहीं जाएगी ! दूध ,हम पी लेते है ,मूत्र से ओषधि बनती है ,गोबर से खेती होती है ! और गोबर गैस गाड़ी चलती है , बिजली बनती है ! सूर्य से जो किरणे इसके शरीर मे आती है उसी कारण इसे दूध मे स्वर्ण गुण आता है और इसके दूध का रंग स्वर्ण (सोने जैसा होता है ) ! और गाय के दूध से 1 ग्राम भी कोलोस्ट्रोल नहीं बढ़ता !

कल से ही देशी गाय का दूध पिये अपने दूध वाले भाई से पूछे वो किस गाय का दूध लाकर आपको दे रहा है (वैसे बहुत से दूध वालों को देशी -जर्सी गाय का अंतर नहीं पता होगा ) आप बता दीजिये दूध देशी गाय का ही पिये ! और घी भी देशी गाय का ही खाएं !! गाय के घी के बारे मे अधिक जानकारी के लिए ये जान लीजिये !

आयुर्वेद मे खाने वाला गाय के दूध का घी निकालने की जो विधि लिखी है उस विधि से आप घी निकले तो आपको 1200 से 2000 रुपए किलो पड़ेगा ! क्योकि 1 किलो घी के लिए 25 से 30 लीटर दूध लग जाता है ! महंगा होने का कारण ये भी है की देशी गाय की संख्या काम होती जा रही है कत्ल बहुत हो रहा है वैसे तो यही घी सबसे बढ़िया है ! लेकिन एक दूसरे ढंग से भी आजकल निकालने लग गए हैं ! जिससे दूध से सीधा क्रीम निकालकर घी बनाया जाता है ! अब समस्या ये है की लगभग सभी कंपनियाँ या तो भैंस का घी बेचती है या गाय का घी बोलकर जर्सी का बेच रही है !

आपको अगर घी खाना ही है तो भारत की सबसे बड़ी गौशाला – विश्व की सबसे बड़ी गौशाला ---
वो है राजस्थान मे उसका नाम है
पथमेढ़ा गौ शाला --------
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वहां का घी खाइये। पथमेढ़ा गौशाला मे 3 लाख देशी गाय है ! इनके घी की सबसे बड़ी विशेषता है ये है की ये देशी गाय का घी ही बेचते हैं ! बस अंतर ये है की यह क्रीम वाले ढंग से निकाला बनाया जाता है लेकिन फिर भी भैंस और जर्सी सूअर के घी की तुलना मे बहुत बहुत बढ़िया है ! लेकिन इसका मूल्य साधारण घी से थोड़ा ज्यादा है ये 1 लीटर 600 रूपये मे उपलब्ध है ! भगवान की अगर आप पर आर्थिक रूप से ज्यादा कृपा तो आप देशी गाय का ही घी खाएं !! कम खा लीजिये लेकिन जर्सी का कभी मत खाएं !! और दूध भी हमेशा देशी गाय का ही पिये !

और अंत मे एक और बात जान लीजिये अब इन विदेशी लोगो को भारत की गाय की महत्ता का अहसास होने लगा है आपको जानकर हैरानी होगी भारतीय नस्ल की सबसे बढ़िया गाय( गीर गाय ) को जर्मनी वाले अपने देश मे ले जाकर इनका वंश आगे बढ़ाकर 2 लाख डालर (लगभग 1 करोड़ की) एक गाय बेच रहें है !
जबकि भारत मे ये गीर गाय सिर्फ 5000 ही रह गई है
The real history...

Friday, February 10, 2017

चौहान_राजपूत


#चौहान_राजपूत
मनीषा सिंह की कलम से संसार एक सागर है, जिसमें अनंत लहरें उठती रहती हैं। ये लहरें कितने ही लोगों के लिए काल बन जाती हैं, तो कुछ ऐसे शूरवीर भी होते हैं जो इन लहरों से ही खेलते हैं और खेलते-खेलते लहरों को अपनी स्वर लहरियों पर नचाने भी लगते हैं। ऐसा संयोग इतिहास के दुर्लभतम क्षणों में ही देखने को मिलता है। कुछ लोग मिट्टी में से उठते हैं, और मिट्टी में ही मिल जाते हैं, पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मिट्टी को सोना बना  देते हैं और उसे इतिहास में गौरव का स्थान दिलाने में सफल हो जाते हैं। कुछ लोग काल के सांचे में ढल जाते हैं, तो कुछ काल के सांचों को ही बदल जाते हैं।
पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज सन ११०५ – ११३० ईस्वी तक शासन किया जिन्हें अजयदेव एवं सल्हाना के नाम से भी जाने जाते हैं राजा अजयदेव चौहान ने ही (1100) ११०० ई. में अजमेर नगर की स्थापना की थी। अजयदेव को 'अजयराज चौहान' कहकर भी कई स्थानों पर सम्बोधित किया गया है । यह सम्भव है कि पुष्कर अथवा अनासागर झील के निकट होने के कारण ही अजयदेव ने अपनी राजधानी का नाम 'अजयमेरु' ('मेर' –झील ) रखा हो । अजयदेव चौहान ने तारागढ़ की पहाड़ी पर एक क़िला 'गढ़-बिटली' नाम से बनवाया था, जिसे कर्नल टॉड ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ में "राजपूताने की कुँजी" कहा है । अजमेर की स्थापना चौहान वंश के राजा अजयराज चौहान ने गढ़ अजयमेरू के नाम से शुक्ल प्रतिपदा के प्रथम दिन की थी । विख्यात चौहान नरेश अजयराज चौहान के नाम पर चारण-भाट इसे 'अजयमेरु' और क़िले को 'अजयमेरु दुर्ग' कहने लगे थे।
पृथ्वीराजविजया एवं बिजोलिया शिलालेख में गजनी की मुस्लिम आक्रमणकारियों पर विजय पाने पर महाराजा अजयराज को विशेष प्रसिद्ध माना गया हैं इन दो भारतीय ग्रंथो के अलावा विदेशी ग्रन्थ तबक़ात-ए-नासिरी एवं तारीख-ए-फिरीश्ता ने भी चौहान राजा अजयराज एवं गजनी के मुस्लिम सेना के मध्य युद्ध का वर्णन मिलता हैं – “ ग़जनी का शासक बहराम शाह ने भारतवर्ष पर आक्रमण करने के लिए सेनापति नियुक्त किया ।“ ग़जनी ने अपने सेना के साथ नागौर पर आक्रमण किया था प्रभावाकाचरिता के अनुसार उस समय नागौर राज्य राजा अजयराज के साम्राज्य का हिस्सा था ।
भारतीय एवं विदेशी इतिहासकारों ने इस बात की पुष्टिकरण किया की अजयराज शाकंभरी (साँभर) के चौहानवंश नरेश ने तुर्क , बगदादी , ख़्वारेज़्म साम्राज्य के आक्रमणकारियों को भारतवर्ष से खदेड़ा था एवं गज़नी शासक बहराम शाह के खिलाफ सफल युद्ध अभियान के द्वारा भारतवर्ष को गजनी शासक के हाथो से मुक्त करवाया था ।
दोबार तुर्क हमलावरों को खदेड़ा था अजयराज चौहान ने जिसके पश्चात तुर्क हमलवारो ने अलग अलग साम्राज्य के सुल्तानों को साथ लेकर संयुक्त युद्ध अभियान किया  ।
अजयराज चौहान इतिहास के प्रथम एवं अंतिम शासक थे जिनके खिलाफ तीन देशो के अलग अलग साम्राज्य के सुल्तानों ने संयुक्त युद्ध अभियान किया जिसमे तुर्क हमलावर सेल्जुक साम्राज्य के सुल्तान गीयाथ- अल- दीन महमूद प्रथम, अब्बासिद साम्राज्य बगदाद के खलीफ़ा अल-अर्शिद , ख़्वारेज़्म साम्राज्य के सुल्तान क़ुतुब-अद-दीन-मुहम्मद प्रथम था । सन १११० में लवपुरा (वर्त्तमान लाहौर) में हुआ था संयुक्त युद्ध अभियान में एक से दो लाख मलेच्छ हमलावरों की सेना थी दूसरी तरफ अजयराज चौहान ने एकछत्र शासन स्थापित करने हेतु जिन जिन राज्य पर विजय पाया था उन पड़ोसी राज्यों के राजा भी अजयराज चौहान की सहायता के लिए रणभूमि में अपनी सेना भेजी (कुछ मुर्ख इतिहासकार कट्टर हिन्दू का चोला पहने हमेसा यह जताते हैं हिन्दू कभी एक नही हुआ एक नही हुआ होता तो भारतवर्ष अखंड नही रहता) सम्राट अजयराज चौहान महापराक्रमी योद्धा थे इन्होने इस युद्ध में मलेच्छ हमलावरों को भारतवर्ष से खदेड़ा था । जहा गदारो ने अपने राजाओ की इतिहास लिखने में गद्दारी किया वही विदेशी लेखको ने न्याय किया Henry Cousens ने अपनी किताब Military History of Invaders में पृष्ठ 48-55 में इस युद्ध को ख़ास स्थान दिया गया हैं इस युद्ध का वर्णन करते हुए अजयराज चौहान को “Safeguard Wall of India” अजयराज चौहान भारतमाता के लिए रक्षा की दिवार थे एवं उनकी तलवार और उनकी बाहुबल कवच थे । दो बार तुर्क हमलावर अजयराज चौहान से परास्त होने के कारण तीसरी बार अकेले युद्ध करने का साहस नही किया जिस करण तीन साम्राज्य के सुल्तानों के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण किया एवं दो लाख की सेना अजयराज चौहान की पराक्रम एवं रणनीति के आगे धराशायी होगये थे । सम्राट अजयराज के तलवारों को कई इतिहासकारों ने जैसे (Jordens Benito ने अपने किताब Ends of Invasions “12th centuries Asia’s ruler of Chahmana Dynasty’s swords took the title of Invaders Slaughter Machine”) अर्थात मलेच्छ वध का यन्त्र कहा हैं (ऐसे इतिहास को मुग़लिया हरम में पले इतिहासकारों ने नही लिखा कैसे लिखते अगर लिखते तो उनके बैंक खाते में अंग्रेजी डॉलर आने बंद होजाते)
Battle of Nagaur (नागौर युद्ध) सन १११८ -:
बहराम शाह ने अपने सेनापति शाहब-उद-दीन को भाड़ी संख्या की सेना के साथ (ग़जनी सेना की संख्या लाखों में हुआ करती थी भिन्न मत हैं इतिहासकारों की कोई कहा तीन लाख तो कोई पांच लाख तो कोई एक लाख अलग अलग इतिहासकारों से अलग अलग संख्याओं की व्याख्यान मिला दुविधा के करण सेना की संख्या यहाँ नही लिख पायी परन्तु यह तय था सेना लाखो की संख्या में थी ) नागौर राज्य पर आक्रमण किया था । नागौर अजयराज के साम्राज्य का हिस्सा था अजयराज अपनी सेना के साथ घेराबंदी बनाये नागौर सीमा पर खड़े थे  गजनी शासक के सेनापति शाहब-उद-दीन ने चौहान सम्राट अजयराज को चेतावनी दिया की वो बहराम शाह की आधीनता स्वीकार कर राजकोष कि धन संपत्ति गजनी शासक को मुवाज़े के तौर पर देने के लिए कहा , परन्तु अजयराज ने शांतिवार्ता ठुकराते हुए युद्धभूमि में लड़ने का आह्वान किया कहा “नागौर को जितना हैं एवं नागौर की धन संपत्ति पर अधिकार करना हैं तो रण में हमे परास्त करना होगा” उसने बड़ी बुद्घिमत्ता से कार्य किया और अपनी सेना की घोड़े की नाल के आकार की व्यूह रचना की जिससे शत्रु सेना का सफाया करने में तथा उसके अहंकार को तोडऩे में उसे सफलता ही मिली । अपने सेना में चेतना भड़ते हुए हुँकार भड़ा एवं लाखों की तादात में आये गजनी की सेना पर टूट परा विजय या वीरगति का लक्ष्य साधे अजयराज काल रूप धारण कर मलेच्छों का संघार करने लगे । तबक़ात-ए-नासिरी vol. III के अनुसार गजनी को भाड़ी नुक्सान उठाना पड़ा इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध हुआ जहाँ गजनी सेना का एक भी सैनिक जीवित नही बचा सेनापति शाहब-उद-दीन भी अजयराज के हाथो मारा गया । अजयराज एक अत्यंत कुशल और दुर्दशिय राजा था जिन्होंने अपने शत्रु को कभी जीवित नही जाने दिया संभवत यही मुख्या करण था बहराम शाह कभी स्वयं अजयराज से युद्ध नही किया उसने अपने सेनापतियो भेजकर युद्ध किया । संदर्भ-: तबक़ात-ए-नासिरी vol. III मिन्हाज-ए-सिराज , प्रभावकाचरिता ,  Early Chauhān Dynasties Dasharatha Sharma (1959)
(The Prithviraja-Vijaya states that Ajayaraja defeated the Garjana Matangas thrice("Ghazna Muslims").The Prabandha Kosha also claims that Ajayaraja defeated "Sahavadina" (Sanskritized form of Shahab-ud-Din). This probably refers to his repulsion of invasions by Ghaznavid generals. The 13th century Muslim historian Minhaj-i-Siraj states that the Ghaznavid ruler Bahram Shah made several expeditions to India during this time.)
पृथ्वीराजविजया के अनुसार अजयराज चौहान ने तीन बार ग़जनी के मुस्लिम सेना को परास्त किया अजयराज चौहान ने ग़जनी के शासक बहराम शाह द्वारा भेजे गये सैन्यबल की सैन्य संचालन मुहम्मद बहलिम नामक सेनापति कर रहा था ग़जनी । सत्यपूर (वर्त्तमान सांचोर ( जालोर )) नामक स्थान पर सन १११९ युद्ध हुआ था अजयराज चौहान एक महावीर योद्धा था जिन्होंने तुर्कों को कई बार खदेड़ा था इनसे मलेच्छ सेना कांपती थी ग़जनी परास्त होने के बाद अगली बार जब आक्रमण करता था तीन गुणा अधिक सैन्यबल के साथ आक्रमण किया सम्राट अजयराज ने फसल नष्ट करवा दिया यह एक रणनीति होती हैं जिससे शत्रु सेना कुछ भी अनाज का सेवन ना कर पायें युद्ध कई दिनों तक चलता था और राशन पर्याप्त नही होता था क्योंकि मुस्लिम सेना लूटमार कर भागने के इरादे से आते थे जिस वजह से राशन अपने साथ नही लाते थे परन्तु युद्ध में भी अगर जाते थे तो जिस राज्य पर आक्रमण करते थे वह के फसल को पका कर खाते थे । यह युद्ध 9 दिवसीय युद्ध था अजयराज चौहान ने अति उतम रणनीति का प्रयोग किया अस पास के फसल को नष्ट करवा दिया घोड़ो के लिए घांस तक खाने को नही छोड़ा । मुहम्मद बहलिम की सेना संख्या में भले ही विशाल सेना थी परन्तु अजयराज के पास बुद्धिमत्तापूर्ण रणनीति था साथ ही चौहान वंश भूजाबल के लिए तो विख्यात थे ही । भीषण युद्ध हुआ इस युद्ध में अजयराज चौहान की रणनीति काम कर गयी एवं लम्बी युद्ध चली नौ दिवसीय जिससे मुहम्मद बहलिम ने आत्मसमर्पण कर भाग खड़ा हुआ । साम , दाम , दंड , वेद का प्रयोग किया अजयराज चौहान की हर योजना सफल सिद्ध हो रही थी और शत्रु अपने ही बुने जाल में फंसकर रह गया था। सत्यपुर की ओर बढ़ते मुहम्मद बहलिम को सत्यपुर ग़जनी से चाहे भले ही दूर ना लगा हो पर अब सत्यपुर से ग़जनी तो इतनी दूर लग रहा था कि संभवत: वह पूरे जन्म भागकर भी उसकी दूरी को नाप न सकेगा। कहा जाता हैं मुहम्मद बहलिम के इस हार के बाद उन्हें बंदी बना लिया जाता हैं बहराम शाह द्वारा । सम्राट अजयराज चौहान की प्रशंसा में यहां जितना लिखा जाए उतना कम है। क्योंकि उसकी देशभक्ति ने समकालीन इतिहास के पृष्ठों पर जिस प्रकार रोमांच और उत्साह का गुलाल छिड़का है उससे हमारे वीरों के ‘वसंत मनाने’ की वास्तविक परिपाटी और वास्तविक उद्देश्य का ज्ञान होता है।
सन ११२१ में Battle of KasyapaPura (वर्त्तमान मुल्तान)
तृतीय युद्ध ग़जनी शासक बहराम शाह ने सालर हुसैन को नागौर विजय के लिए भेजा था अजयराज चौहान के गुप्तचरों ने उन्हें पहले से सावधान कर दिया था अजयराज चौहान ने बुद्धि एवं पराक्रम का अद्भुत उदाहरण पेश किया कश्यप-पुरा (मुल्तान) एवं सिन्धु नदी के सीमारेखा पर चौहान सेना दीवार बन के खड़ा था सालर हुसैन को इस बात की उपेक्षा नही थी की राजपूत सेना कश्यप-पुरा (मुल्तान) एवं सिन्धु नदी की सीमारेखा पर रक्षा कवच बने खड़े होंगे ग़जनी की सेना को संभालने का मौका तक नही मिला राजपूत सेना ने तीरों की बौछारें करने लग गये जिससे ग़जनी की सेना तितर बितर होगया इससे पहले की सालर हुसैन कुछ समझ पाते सालर हुसैन की समंदर जितना विशाल सेना आधा से ज्यादा राजपूत सेना की तीरों की बौछार से ख़तम होगये थे और आधी सेना को राजपूत सम्राट अजयराज चौहान की २५,००० पैदल सैन्यबल काल बनकर निगल गये सालर हुसैन की मृत्यु अजयराज चौहान के हाथो हुआ सालर हुसैन को परास्त कर कम्बोज (वर्त्तमान काबुल) पर आक्रमण कर कम्बोज से गजनी का शासक बहराम शाह को खदेड़ा । बहराम शाह ने खुद लिखा था “अजयराज चौहान की वजह से दिल्ली का तख्त ही नही सम्पूर्ण भारतवर्ष उनके हाथ से निकल गया था” Reference-: Period of Ghaznavids C.E. Bosworth Page-: 120
कुछ इतिहासकारों के अनुसार राजपूतो ने ग़जनी पर वापस अपना आधिपत्यं स्थापित कर लिया था और इतिहासकार लेविट डुसों (Lewitt Duson) Rajputana Ruler of Centuries के अनुसार अजयराज चौहान का शासन था ग़जनी पर परन्तु इस विषय में ज्यादा तथ्य ना मिलने के करण दावे के साथ कुछ नही कह सकती ।      
महाराजा अजयराज जी ने उम्र के आखिरी पङाव मे राज-काज छोड़ प्रभु भक्ति कि तरफ मुंह किया और योगी हो गए । उस जमाने में राजपूत जब इस उम्र में घर त्याग करते तो अपना घोड़ा व तलवार साथ रखते थे और सफेद वस्त्र धारण कर एकांत वास को चले जाते थे ।।
अजयराज चौहान को केवल अजयमेरु शहर के निर्माण के लिए जाना जाता हैं परन्तु कोई भी इतिहासकार जो भारत के सच्चे इतिहास का लेखन करते हैं उनमे से किसी ने भी सत्य को नही लिखा यहाँ तक राजपूत इतिहासकार भी चुक गये दशरथ शर्मा एवं मिन्हाज-ए-नसीरी , तारीख-ए-फिरीश्ता , पृथ्वीराजविजया , प्रबंधकोश के अलावा कही और नही मिलता हैं । अजयराज चौहान के सहशक्त राजा थे इन्होने साम्राज्य विस्तार के अलवा ग़जनी शासक के नागौर आक्रमण के बाद उन्होंने दूरदर्शिता से काम लेते हुए भारतवर्ष की सीमारेखा पर मजबूत सुरक्षाकवच का निर्माण किया । अजयराज को अपराजे सम्राट कहना कदापि गलत नही होगा बारहवीं सताब्दी जब भारत पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे थे मलेच्छ हमलावरों का उसवक्त अजयराज ने इन विदेशी आक्रमणकारियों का दमन कर भारत को मुक्त करवाया था । वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ऐसे अप्रतिम योद्धा के कृतियों को नज़रंदाज़ करने का फल आज हम सब भुगत रहे हैं भारत में अकबर , तैमुर , गोरी पैदा हो रहे हैं परन्तु हिन्दुओं में कोई अजयराज चौहान , वाक्पतिराज , पृथ्वीराज चौहान , महाराणा प्रताप , लक्ष्मीबाई , रानी कुरमदेवी जन्म नही ले पा रही हैं ।

चौहान_राजपूत


#चौहान_राजपूत
मनीषा सिंह की कलम से संसार एक सागर है, जिसमें अनंत लहरें उठती रहती हैं। ये लहरें कितने ही लोगों के लिए काल बन जाती हैं, तो कुछ ऐसे शूरवीर भी होते हैं जो इन लहरों से ही खेलते हैं और खेलते-खेलते लहरों को अपनी स्वर लहरियों पर नचाने भी लगते हैं। ऐसा संयोग इतिहास के दुर्लभतम क्षणों में ही देखने को मिलता है। कुछ लोग मिट्टी में से उठते हैं, और मिट्टी में ही मिल जाते हैं, पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मिट्टी को सोना बना  देते हैं और उसे इतिहास में गौरव का स्थान दिलाने में सफल हो जाते हैं। कुछ लोग काल के सांचे में ढल जाते हैं, तो कुछ काल के सांचों को ही बदल जाते हैं।
पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज सन ११०५ – ११३० ईस्वी तक शासन किया जिन्हें अजयदेव एवं सल्हाना के नाम से भी जाने जाते हैं राजा अजयदेव चौहान ने ही (1100) ११०० ई. में अजमेर नगर की स्थापना की थी। अजयदेव को 'अजयराज चौहान' कहकर भी कई स्थानों पर सम्बोधित किया गया है । यह सम्भव है कि पुष्कर अथवा अनासागर झील के निकट होने के कारण ही अजयदेव ने अपनी राजधानी का नाम 'अजयमेरु' ('मेर' –झील ) रखा हो । अजयदेव चौहान ने तारागढ़ की पहाड़ी पर एक क़िला 'गढ़-बिटली' नाम से बनवाया था, जिसे कर्नल टॉड ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ में "राजपूताने की कुँजी" कहा है । अजमेर की स्थापना चौहान वंश के राजा अजयराज चौहान ने गढ़ अजयमेरू के नाम से शुक्ल प्रतिपदा के प्रथम दिन की थी । विख्यात चौहान नरेश अजयराज चौहान के नाम पर चारण-भाट इसे 'अजयमेरु' और क़िले को 'अजयमेरु दुर्ग' कहने लगे थे।
पृथ्वीराजविजया एवं बिजोलिया शिलालेख में गजनी की मुस्लिम आक्रमणकारियों पर विजय पाने पर महाराजा अजयराज को विशेष प्रसिद्ध माना गया हैं इन दो भारतीय ग्रंथो के अलावा विदेशी ग्रन्थ तबक़ात-ए-नासिरी एवं तारीख-ए-फिरीश्ता ने भी चौहान राजा अजयराज एवं गजनी के मुस्लिम सेना के मध्य युद्ध का वर्णन मिलता हैं – “ ग़जनी का शासक बहराम शाह ने भारतवर्ष पर आक्रमण करने के लिए सेनापति नियुक्त किया ।“ ग़जनी ने अपने सेना के साथ नागौर पर आक्रमण किया था प्रभावाकाचरिता के अनुसार उस समय नागौर राज्य राजा अजयराज के साम्राज्य का हिस्सा था ।
भारतीय एवं विदेशी इतिहासकारों ने इस बात की पुष्टिकरण किया की अजयराज शाकंभरी (साँभर) के चौहानवंश नरेश ने तुर्क , बगदादी , ख़्वारेज़्म साम्राज्य के आक्रमणकारियों को भारतवर्ष से खदेड़ा था एवं गज़नी शासक बहराम शाह के खिलाफ सफल युद्ध अभियान के द्वारा भारतवर्ष को गजनी शासक के हाथो से मुक्त करवाया था ।
दोबार तुर्क हमलावरों को खदेड़ा था अजयराज चौहान ने जिसके पश्चात तुर्क हमलवारो ने अलग अलग साम्राज्य के सुल्तानों को साथ लेकर संयुक्त युद्ध अभियान किया  ।
अजयराज चौहान इतिहास के प्रथम एवं अंतिम शासक थे जिनके खिलाफ तीन देशो के अलग अलग साम्राज्य के सुल्तानों ने संयुक्त युद्ध अभियान किया जिसमे तुर्क हमलावर सेल्जुक साम्राज्य के सुल्तान गीयाथ- अल- दीन महमूद प्रथम, अब्बासिद साम्राज्य बगदाद के खलीफ़ा अल-अर्शिद , ख़्वारेज़्म साम्राज्य के सुल्तान क़ुतुब-अद-दीन-मुहम्मद प्रथम था । सन १११० में लवपुरा (वर्त्तमान लाहौर) में हुआ था संयुक्त युद्ध अभियान में एक से दो लाख मलेच्छ हमलावरों की सेना थी दूसरी तरफ अजयराज चौहान ने एकछत्र शासन स्थापित करने हेतु जिन जिन राज्य पर विजय पाया था उन पड़ोसी राज्यों के राजा भी अजयराज चौहान की सहायता के लिए रणभूमि में अपनी सेना भेजी (कुछ मुर्ख इतिहासकार कट्टर हिन्दू का चोला पहने हमेसा यह जताते हैं हिन्दू कभी एक नही हुआ एक नही हुआ होता तो भारतवर्ष अखंड नही रहता) सम्राट अजयराज चौहान महापराक्रमी योद्धा थे इन्होने इस युद्ध में मलेच्छ हमलावरों को भारतवर्ष से खदेड़ा था । जहा गदारो ने अपने राजाओ की इतिहास लिखने में गद्दारी किया वही विदेशी लेखको ने न्याय किया Henry Cousens ने अपनी किताब Military History of Invaders में पृष्ठ 48-55 में इस युद्ध को ख़ास स्थान दिया गया हैं इस युद्ध का वर्णन करते हुए अजयराज चौहान को “Safeguard Wall of India” अजयराज चौहान भारतमाता के लिए रक्षा की दिवार थे एवं उनकी तलवार और उनकी बाहुबल कवच थे । दो बार तुर्क हमलावर अजयराज चौहान से परास्त होने के कारण तीसरी बार अकेले युद्ध करने का साहस नही किया जिस करण तीन साम्राज्य के सुल्तानों के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण किया एवं दो लाख की सेना अजयराज चौहान की पराक्रम एवं रणनीति के आगे धराशायी होगये थे । सम्राट अजयराज के तलवारों को कई इतिहासकारों ने जैसे (Jordens Benito ने अपने किताब Ends of Invasions “12th centuries Asia’s ruler of Chahmana Dynasty’s swords took the title of Invaders Slaughter Machine”) अर्थात मलेच्छ वध का यन्त्र कहा हैं (ऐसे इतिहास को मुग़लिया हरम में पले इतिहासकारों ने नही लिखा कैसे लिखते अगर लिखते तो उनके बैंक खाते में अंग्रेजी डॉलर आने बंद होजाते)
Battle of Nagaur (नागौर युद्ध) सन १११८ -:
बहराम शाह ने अपने सेनापति शाहब-उद-दीन को भाड़ी संख्या की सेना के साथ (ग़जनी सेना की संख्या लाखों में हुआ करती थी भिन्न मत हैं इतिहासकारों की कोई कहा तीन लाख तो कोई पांच लाख तो कोई एक लाख अलग अलग इतिहासकारों से अलग अलग संख्याओं की व्याख्यान मिला दुविधा के करण सेना की संख्या यहाँ नही लिख पायी परन्तु यह तय था सेना लाखो की संख्या में थी ) नागौर राज्य पर आक्रमण किया था । नागौर अजयराज के साम्राज्य का हिस्सा था अजयराज अपनी सेना के साथ घेराबंदी बनाये नागौर सीमा पर खड़े थे  गजनी शासक के सेनापति शाहब-उद-दीन ने चौहान सम्राट अजयराज को चेतावनी दिया की वो बहराम शाह की आधीनता स्वीकार कर राजकोष कि धन संपत्ति गजनी शासक को मुवाज़े के तौर पर देने के लिए कहा , परन्तु अजयराज ने शांतिवार्ता ठुकराते हुए युद्धभूमि में लड़ने का आह्वान किया कहा “नागौर को जितना हैं एवं नागौर की धन संपत्ति पर अधिकार करना हैं तो रण में हमे परास्त करना होगा” उसने बड़ी बुद्घिमत्ता से कार्य किया और अपनी सेना की घोड़े की नाल के आकार की व्यूह रचना की जिससे शत्रु सेना का सफाया करने में तथा उसके अहंकार को तोडऩे में उसे सफलता ही मिली । अपने सेना में चेतना भड़ते हुए हुँकार भड़ा एवं लाखों की तादात में आये गजनी की सेना पर टूट परा विजय या वीरगति का लक्ष्य साधे अजयराज काल रूप धारण कर मलेच्छों का संघार करने लगे । तबक़ात-ए-नासिरी vol. III के अनुसार गजनी को भाड़ी नुक्सान उठाना पड़ा इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध हुआ जहाँ गजनी सेना का एक भी सैनिक जीवित नही बचा सेनापति शाहब-उद-दीन भी अजयराज के हाथो मारा गया । अजयराज एक अत्यंत कुशल और दुर्दशिय राजा था जिन्होंने अपने शत्रु को कभी जीवित नही जाने दिया संभवत यही मुख्या करण था बहराम शाह कभी स्वयं अजयराज से युद्ध नही किया उसने अपने सेनापतियो भेजकर युद्ध किया । संदर्भ-: तबक़ात-ए-नासिरी vol. III मिन्हाज-ए-सिराज , प्रभावकाचरिता ,  Early Chauhān Dynasties Dasharatha Sharma (1959)
(The Prithviraja-Vijaya states that Ajayaraja defeated the Garjana Matangas thrice("Ghazna Muslims").The Prabandha Kosha also claims that Ajayaraja defeated "Sahavadina" (Sanskritized form of Shahab-ud-Din). This probably refers to his repulsion of invasions by Ghaznavid generals. The 13th century Muslim historian Minhaj-i-Siraj states that the Ghaznavid ruler Bahram Shah made several expeditions to India during this time.)
पृथ्वीराजविजया के अनुसार अजयराज चौहान ने तीन बार ग़जनी के मुस्लिम सेना को परास्त किया अजयराज चौहान ने ग़जनी के शासक बहराम शाह द्वारा भेजे गये सैन्यबल की सैन्य संचालन मुहम्मद बहलिम नामक सेनापति कर रहा था ग़जनी । सत्यपूर (वर्त्तमान सांचोर ( जालोर )) नामक स्थान पर सन १११९ युद्ध हुआ था अजयराज चौहान एक महावीर योद्धा था जिन्होंने तुर्कों को कई बार खदेड़ा था इनसे मलेच्छ सेना कांपती थी ग़जनी परास्त होने के बाद अगली बार जब आक्रमण करता था तीन गुणा अधिक सैन्यबल के साथ आक्रमण किया सम्राट अजयराज ने फसल नष्ट करवा दिया यह एक रणनीति होती हैं जिससे शत्रु सेना कुछ भी अनाज का सेवन ना कर पायें युद्ध कई दिनों तक चलता था और राशन पर्याप्त नही होता था क्योंकि मुस्लिम सेना लूटमार कर भागने के इरादे से आते थे जिस वजह से राशन अपने साथ नही लाते थे परन्तु युद्ध में भी अगर जाते थे तो जिस राज्य पर आक्रमण करते थे वह के फसल को पका कर खाते थे । यह युद्ध 9 दिवसीय युद्ध था अजयराज चौहान ने अति उतम रणनीति का प्रयोग किया अस पास के फसल को नष्ट करवा दिया घोड़ो के लिए घांस तक खाने को नही छोड़ा । मुहम्मद बहलिम की सेना संख्या में भले ही विशाल सेना थी परन्तु अजयराज के पास बुद्धिमत्तापूर्ण रणनीति था साथ ही चौहान वंश भूजाबल के लिए तो विख्यात थे ही । भीषण युद्ध हुआ इस युद्ध में अजयराज चौहान की रणनीति काम कर गयी एवं लम्बी युद्ध चली नौ दिवसीय जिससे मुहम्मद बहलिम ने आत्मसमर्पण कर भाग खड़ा हुआ । साम , दाम , दंड , वेद का प्रयोग किया अजयराज चौहान की हर योजना सफल सिद्ध हो रही थी और शत्रु अपने ही बुने जाल में फंसकर रह गया था। सत्यपुर की ओर बढ़ते मुहम्मद बहलिम को सत्यपुर ग़जनी से चाहे भले ही दूर ना लगा हो पर अब सत्यपुर से ग़जनी तो इतनी दूर लग रहा था कि संभवत: वह पूरे जन्म भागकर भी उसकी दूरी को नाप न सकेगा। कहा जाता हैं मुहम्मद बहलिम के इस हार के बाद उन्हें बंदी बना लिया जाता हैं बहराम शाह द्वारा । सम्राट अजयराज चौहान की प्रशंसा में यहां जितना लिखा जाए उतना कम है। क्योंकि उसकी देशभक्ति ने समकालीन इतिहास के पृष्ठों पर जिस प्रकार रोमांच और उत्साह का गुलाल छिड़का है उससे हमारे वीरों के ‘वसंत मनाने’ की वास्तविक परिपाटी और वास्तविक उद्देश्य का ज्ञान होता है।
सन ११२१ में Battle of KasyapaPura (वर्त्तमान मुल्तान)
तृतीय युद्ध ग़जनी शासक बहराम शाह ने सालर हुसैन को नागौर विजय के लिए भेजा था अजयराज चौहान के गुप्तचरों ने उन्हें पहले से सावधान कर दिया था अजयराज चौहान ने बुद्धि एवं पराक्रम का अद्भुत उदाहरण पेश किया कश्यप-पुरा (मुल्तान) एवं सिन्धु नदी के सीमारेखा पर चौहान सेना दीवार बन के खड़ा था सालर हुसैन को इस बात की उपेक्षा नही थी की राजपूत सेना कश्यप-पुरा (मुल्तान) एवं सिन्धु नदी की सीमारेखा पर रक्षा कवच बने खड़े होंगे ग़जनी की सेना को संभालने का मौका तक नही मिला राजपूत सेना ने तीरों की बौछारें करने लग गये जिससे ग़जनी की सेना तितर बितर होगया इससे पहले की सालर हुसैन कुछ समझ पाते सालर हुसैन की समंदर जितना विशाल सेना आधा से ज्यादा राजपूत सेना की तीरों की बौछार से ख़तम होगये थे और आधी सेना को राजपूत सम्राट अजयराज चौहान की २५,००० पैदल सैन्यबल काल बनकर निगल गये सालर हुसैन की मृत्यु अजयराज चौहान के हाथो हुआ सालर हुसैन को परास्त कर कम्बोज (वर्त्तमान काबुल) पर आक्रमण कर कम्बोज से गजनी का शासक बहराम शाह को खदेड़ा । बहराम शाह ने खुद लिखा था “अजयराज चौहान की वजह से दिल्ली का तख्त ही नही सम्पूर्ण भारतवर्ष उनके हाथ से निकल गया था” Reference-: Period of Ghaznavids C.E. Bosworth Page-: 120
कुछ इतिहासकारों के अनुसार राजपूतो ने ग़जनी पर वापस अपना आधिपत्यं स्थापित कर लिया था और इतिहासकार लेविट डुसों (Lewitt Duson) Rajputana Ruler of Centuries के अनुसार अजयराज चौहान का शासन था ग़जनी पर परन्तु इस विषय में ज्यादा तथ्य ना मिलने के करण दावे के साथ कुछ नही कह सकती ।      
महाराजा अजयराज जी ने उम्र के आखिरी पङाव मे राज-काज छोड़ प्रभु भक्ति कि तरफ मुंह किया और योगी हो गए । उस जमाने में राजपूत जब इस उम्र में घर त्याग करते तो अपना घोड़ा व तलवार साथ रखते थे और सफेद वस्त्र धारण कर एकांत वास को चले जाते थे ।।
अजयराज चौहान को केवल अजयमेरु शहर के निर्माण के लिए जाना जाता हैं परन्तु कोई भी इतिहासकार जो भारत के सच्चे इतिहास का लेखन करते हैं उनमे से किसी ने भी सत्य को नही लिखा यहाँ तक राजपूत इतिहासकार भी चुक गये दशरथ शर्मा एवं मिन्हाज-ए-नसीरी , तारीख-ए-फिरीश्ता , पृथ्वीराजविजया , प्रबंधकोश के अलावा कही और नही मिलता हैं । अजयराज चौहान के सहशक्त राजा थे इन्होने साम्राज्य विस्तार के अलवा ग़जनी शासक के नागौर आक्रमण के बाद उन्होंने दूरदर्शिता से काम लेते हुए भारतवर्ष की सीमारेखा पर मजबूत सुरक्षाकवच का निर्माण किया । अजयराज को अपराजे सम्राट कहना कदापि गलत नही होगा बारहवीं सताब्दी जब भारत पर सबसे ज्यादा हमले हो रहे थे मलेच्छ हमलावरों का उसवक्त अजयराज ने इन विदेशी आक्रमणकारियों का दमन कर भारत को मुक्त करवाया था । वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ऐसे अप्रतिम योद्धा के कृतियों को नज़रंदाज़ करने का फल आज हम सब भुगत रहे हैं भारत में अकबर , तैमुर , गोरी पैदा हो रहे हैं परन्तु हिन्दुओं में कोई अजयराज चौहान , वाक्पतिराज , पृथ्वीराज चौहान , महाराणा प्रताप , लक्ष्मीबाई , रानी कुरमदेवी जन्म नही ले पा रही हैं ।

अपने में अच्छी आदतें डालिए। (अंतिम भाग)

👉 अपने में अच्छी आदतें डालिए। (अंतिम भाग)

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 अपने में अच्छी आदतें डालिए। (अंतिम भाग)

🔵 आज जो आदतें पड़ी हुई हैं किसी समय वह भी नई रहीं होगी और उनको अपने पैर जमाने में अपने से पुरानी आदतों के साथ उसी प्रकार संघर्ष करना पड़ा होगा जैसा कि आज नई आदतें डालने की हमारी इच्छा को पुरानी आदतों से संघर्ष करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में निराश होने का कोई कारण नहीं। जब पूर्वकाल में पुरानी आदतों को हटाकर नई आदतें डालने में हम सफल हो चुके हैं तो कोई कारण नहीं कि अब फिर वैसा न किया जा सके।
🔴 ईश्वर का अस्तित्व, जीवन की हर एक स्थिति में, हर जगह और हर समय ध्यान में रखना हमारी एक स्वाभाविक आदत होनी चाहिए और इस आदत का बीजारोपण जीवन के शुरुआत से ही करना चाहिए। क्योंकि यह आदत जीवन की श्रेष्ठतम आदतों में सर्वोपरि महत्व की है।
🔵 जो मनुष्य ईश्वर पर विश्वास करता है, सदैव उसका ध्यान रखता है, हर जगह उसकी सत्ता को देखता है वह पाप कर्म नहीं कर सकता। जो ईश्वर विश्वासी है वह परम निर्भय रहता है, उसे मृत्यु का, हानि का, रोग का, वियोग का,आक्रमण का, ठगी का या किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। ईश्वर भक्त सदा ही निर्भय और निर्बन्ध रहते हैं।
🔴 आप अच्छी आदतें डालिए। क्योंकि आदतों से ही मनुष्य की जीवन धारा का निर्माण होता है। ईश्वर परायणता, आस्तिकता सब से अच्छी आदत है, क्योंकि उसके साथ-साथ वे सभी आदतें अपने आप अपने में आ जाती हैं जो जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए परम आवश्यक हैं।
🌹 समाप्त🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 28

http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1949/June.28

👉 अपने में अच्छी आदतें डालिए। (भाग 1)

👉 अपने में अच्छी आदतें डालिए। (भाग 1)

Atmiya Parijan सुनील कुमार!

👉 अपने में अच्छी आदतें डालिए। (भाग 1)

🔵 पहले एक विचार उत्पन्न होता है फिर वह शारीरिक अभ्यास में लाया जाता है और बार-बार और लगातार दुहराया जाता है उसी को आदत नाम दिया गया है।
🔴 आदत, बिजली की शक्ति के समान तेज और शक्तिशाली होती है। मनुष्य अपनी आदत का एक खिलौना बन जाता है और उसी के आधार पर उसके भविष्य का निर्माण होता है। कारण यह है कि उसे अपनी आदत के समान मित्र,साधन, विचार और अवसर बराबर प्राप्त होते रहते हैं। एक सी आदत वालों में स्वाभाविक प्रेम और एक दूसरे के विरुद्ध आदत वालों में स्वाभाविक भिन्नता बिना किसी परिचय के ही पायी जाती है।
🔵 पुरानी आदतें नयी आदतों की बजाय अधिक शक्तिशाली होती हैं। जब कभी आप नई आदतों का बीजारोपण करना चाहते हैं तो पुरानी आदतें उसमें बार-बार बाधा डालती हैं और नई आदत को बढ़ने से रोकती हैं। जिससे वह नई आदत डालने वाला व्यक्ति घबरा कर निराश हो जाता है और जब तक वह आदत के सिद्धान्त और असलियत का अनुभव नहीं कर लेता, सोचता है कि बदनसीब है, परन्तु ऐसा सोचना भूल है।पुरानी आदतें जो आज इतनी प्रबल हो रही हैं, एक दिन में नहीं पड़ गई हैं। काफी लम्बे समय तक, काफी दिलचस्पी के साथ अनेकों बार उन्हें क्रिया रूप में परिणित किया गया है तब वे आज इतनी मजबूत बन पाई हैं कि हमारे मन पर वे अधिकार जमा सकीं है और नई आदतों को न जगने देने के लिए संघर्ष करती हैं। इससे सिद्ध होता है कि कोई भी आदत तब मजबूत होती है जब उसका पर्याप्त समय तक कार्य रूप में अभ्यास किया जाता है।
🌹 क्रमशः जारी🌹 अखण्ड ज्योति- जून 1949 पृष्ठ 28



"चलते रहे कदम तो,

"चलते रहे कदम तो,               किनारा जरुर मिलेगा !! अन्धकार से लड़ते रहो,               सवेरा जरुर खिलेगा !! जब ठान लिया मंजिल प...